अंतर्मन का उद्घोष
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पुस्तक समीक्षा
लेखिका : शशि दीप
विधा : लेख संग्रह
पब्लिशर: समृद्ध पब्लिकेशन, दिल्ली
बरसों की साधना के बाद कोई
अंतर्मन का उदघोष सुन पाता है
मनुष्य के मन के भी अंदर एक मन होता है जिसे हिंदी साहित्य में अंतर्मन का नाम दिया गया है। मन और अंतर्मन में बहुत बारीक सा अंतर होता है जिसे अंतर्मुख व्यक्ति ही पकड़ पाता है।इस पर अंतर्मन का उदघोष को पकड़ना साधारण व्यक्ति,सामान्य साहित्यकर या विद्वान के वश की बात नहीं है।श्रीमती शशि दीप ने बरसों के साहित्य साधना के बाद इस घोष को पकड़ा है अतः यह घोष तो सारी दुनिया में आवाज करेगा ही और अपने अस्तित्व से भी प्रबुध्द जगत को परिचित कराएगा।
इस पुस्तक के बारे में और भी कुछ कहूँ उससे पूर्व मैं डॉ.विनय कुमार पाठक छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान में थावे विद्यापीठ गोपालगंज के कुलपति के विचारों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा- ‘श्रीमती शशि दीप के समय- समय पर लिखित और विभिन्न विषयों पर केंद्रित 'अंतर्मन का उदघोष 'ऐसे आलेखों का संग्रह है जिसमें इनके नामानुरूप इनकी आत्मा की आवाज संवेदना से संचरित और विचारों से आचरित होकर प्रस्तुत हुआ है।"
जब हम किसी घटना , दुर्घटना या बात से प्रभावित होते हैं तो मन में विचारों का आंदोलन होता है।यह आंदोलन जब किसी परिणाम पर पहुंचता है और सोचता है.. ऐसा हुआ होगा.. तब कहीं से एक आवाज आती है.. नहीं ऐसा नहीं है ये ऐसा हुआ है।यह ही अंतर्मन का उदघोष है जो 'होगा’ पर नहीं हुआ है' की घोषणा करता है।
श्रीमती शशि दीप हिंदी और अंग्रेजी की संयुक्त लेखिका के रूप में प्रतिष्ठित हैं।उनकी यह किताब उनके अंतर्मन के उदघोषों का लेखा है।ये उदघोष समय- समय पर उनके संस्कारों के माध्यम से घोषित हुए और पुस्तक की पृष्ठों में दर्ज हुए हैं।
श्रीमती शशि ने पुस्तक के समर्पण में ही यह बात स्वीकारी है कि- ‘अंतर्मन का उदघोष मूल रूप से मेरी जननी, मेरी आदर्श, मेरे संस्कार की पाठशाला, मेरी दिवंगत माता सूरज भागवत प्रसाद केशकर के श्रीचरणों को समर्पित कर रही हूं।’इससे स्पष्ट है कि ये घोष संस्कारों से मिली शिक्षा ने किए हैं।
लगभग डेढ़ सौ पेज की इस पुस्तक और इतने गूढ़ विषय पर इस जगह अपनी बात रख पाना कठिन है फिर भी कुछ बातें मैं जरूर कहूंगा।अंतर्मन का उदघोष केवल शशि जी के मन का घोष नहीं है, यह तो हर मन के भीतर का घोष है जो समय- समय पर उदघोषित होता रहता है।यह पुस्तक छोटे-छोटे शीर्षकों में लिखा गया है जो वर्षों की साधना का संकेतक है।
पुस्तक में दर्ज आलेखों के शीर्षक पर हम दृष्टि डालें तो बहुत कुछ साफ हो सकता है-गणपति बप्पा क्या लाते हैं, अपने साथ और क्या ले जाते हैं/जरूरी नहीं हर महिला होममेकर होने से कुंठित रहे/महिलाएं अपनी फ़जीहत खुद करा रही हैं/अराजकता का बोल-बाला,विलुप्त होती सद्भावना/निज स्वार्थ से अधिक परमार्थ में मिलती है शांति/सोशल इन्फ्लूएंसर्स का अंधाधुंध इलुएन्स/आखिर सच्चाई छुप नहीं सकती/अहंकार का स्वादिष्ट व्यंजन है उपलब्धि/क्या हमें प्रतिदिन वाह्य प्रेरणा के आधीन होना चाहिए/अपने भी तभी अपने रहते हैं।ऐसे और भी शीर्षक एवं उनके शीर्ष आलेख इस पुस्तक में संकलित हैं।
जहां तक पुस्तक की भाषा शैली पर हम बात करें तो वह बोलचाल की किन्तु सधी हुई भाषा है।श्रीमती शशि जी का जन्म बिलासपुर में हुआ है किंतु गृहणी के रूप में कर्मभूमि मुंबई महाराष्ट्र है।कहां बिलासपुर शहर और कहां मुंबई जैसी गतिशील और मेट्रो सिटी में रहकर हिंदी साहित्य की आराधना करना ही अपने आप में बड़ी बात है।इस पर इस तरह का उत्कृष्ट साहित्य रचना तो और ही बड़ी बात है।
अंत में मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि 30 नवंबर 2025 को मैं अपनी बड़ी बेटी के घर भोपाल आया तब मुझे यह 'अंतर्मन का उदघोष' पुस्तक प्रेसक्लब ऑफ वर्किंग जनर्लिस्ट भारत के अध्यक्ष डॉ.सैयद खालिद कैश के हाथों प्राप्त हो गई थी। उल्लेखनीय है कि शशि जी स्वयं प्रेसक्लब ऑफ वर्किंग जनर्लिस्ट भारत की संगठन महासचिव हैं।
इस पुस्तक पर अपने विचार लिखने का मन तब से मेरे मन में था पर किसी न किसी विद्वान की समीक्षा अथवा समाचार पत्र में इस पुस्तक के संदर्भ में विचार प्रकाशित होते चले आ रहे हैं।इस पुस्तक पर देश भर में चर्चा हो रही है।ऐसे में मैं क्या लिखूं,यह असमंजस की स्थिति बनी रही है पर मन का कोई कोना कह रहा था कि तुझे कुछ लिखना होगा।
अंतर्मन का उदघोष हर पत्रकार एवं लेखन से जुड़े हर लेखक के लिए पढ़ना जरूरी है। यह हमें उस दिशा का दिग्दर्शन कराती है जिस दिशा में हमें जाना चाहिए। यह पुस्तक समृध्द पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित है। मूल्य मात्र 299 ₹ है। यह अमेजन, फ्लिपकार्ट, किंडल आदि ऑनलाइन से भी सर्चकर मंगाई जा सकती है। यह किताब हर पढ़ने-लिखने वाले की निजी लायब्रेरी में संग्रहित की जानी चाहिये।
अंत मैं श्रीमती शशि दीप को इस पुस्तक के प्रकाशन पर ह्रदय से बधाई देता हूं तथा यह कामना करता हूं कि आपकी यह किताब हिंदी-अंग्रेजी साहित्य के साथ संपूर्ण साहित्य जगत को अपने आलोक से आलोकित करे।
- केशव शुक्ला
वरिष्ठ साहित्यकार/पत्रकार
समीक्षक दैनिक भास्कर के पूर्व संपादक रह चुके हैं
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

