बेटियों की सांस गर्भ में ही क्यों घुट रही है?
https://www.zeromilepress.com/2026/06/blog-post_543.html
स्त्री भ्रूण हत्या का काला चेहरा और समाज की भयावह सच्चाई
मानवता के इतिहास के सबसे बड़े विरोधाभासों में से एक यह है कि जिस समाज में नारी को पूजनीय माना जाता है, वही समाज आज उसके अस्तित्व पर प्रहार कर रहा है। एक ओर हम गर्व से कहते हैं, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहीं देवताओं का वास होता है; दूसरी ओर अनेक मासूम बेटियों की सांसें जन्म लेने से पहले ही गर्भ में घोंट दी जाती हैं। यह केवल कानून या चिकित्सा क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और विवेक पर पड़ा एक गहरा घाव है।
हाल के दिनों में सामने आई कुछ घटनाओं ने एक बार फिर स्त्री भ्रूण हत्या के भयावह स्वरूप को उजागर किया है। भ्रूण लिंग परीक्षण, अवैध गर्भपात और पैसों के लिए इंसानियत का सौदा करने वाली प्रवृत्तियाँ समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। गर्भ में पल रहे एक जीवन का मूल्य कुछ हजार रुपयों में तय किया जाने लगा है, यह हमारे सामाजिक पतन की दुखद कहानी है।
प्यू रिसर्च सहित विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भारत में लिंगानुपात की समस्या को बार-बार रेखांकित किया गया है। पिछले दो दशकों में लाखों बेटियाँ जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर दी गईं, यह भयावह सच्चाई अनेक रिपोर्टों में सामने आई है। विज्ञान और तकनीक का उपयोग जीवन बचाने के लिए होना चाहिए था, लेकिन कुछ स्थानों पर उसी तकनीक का उपयोग बेटियों के अस्तित्व को मिटाने के लिए किया गया। इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है?
सवाल यह है कि आखिर स्त्री भ्रूण हत्या होती ही क्यों है?
इसके पीछे पुत्र मोह और बेटे को प्राथमिकता देने वाली मानसिकता का विषैला बीज है। बेटा वंश का दीपक, बुढ़ापे का सहारा और संपत्ति का वारिस माना जाता है, जबकि बेटी को जिम्मेदारी, खर्च और बोझ समझा जाता है। यह पुरानी और संकीर्ण सोच आज भी समाज के कई हिस्सों में जीवित है। शिक्षा, आधुनिकता और तकनीकी प्रगति के इस युग में भी सोच मध्ययुगीन बनी हुई है। परिणामस्वरूप बेटियों के जन्मदर में गिरावट देखने को मिलती है।
आज बेटियाँ हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही हैं। अंतरिक्ष से लेकर सेना तक, प्रशासन से लेकर उद्योग जगत तक, खेल के मैदान से लेकर वैज्ञानिक अनुसंधान तक महिलाओं ने अपनी उपलब्धियों की अमिट छाप छोड़ी है। इसके बावजूद उनके जन्म का विरोध होना समाज के लिए शर्मनाक है।
स्त्री भ्रूण हत्या केवल एक बेटी की हत्या नहीं होती। यह एक माँ, एक बहन, एक वैज्ञानिक, एक शिक्षिका, एक नेता या एक कलाकार की हत्या होती है। गर्भ में समाप्त किया गया प्रत्येक जीवन समाज के भविष्य की एक संभावित संभावना को भी समाप्त कर देता है।
इसके लिए केवल माता-पिता ही जिम्मेदार नहीं हैं। अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण और गर्भपात की पूरी श्रृंखला में शामिल प्रत्येक व्यक्ति इस अपराध का भागीदार है। पैसों के लिए नैतिकता और चिकित्सा की शपथ भूलने वालों पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है। दोष सिद्ध होने पर ऐसे मामलों में सख्त सजा, चिकित्सा लाइसेंस रद्द करना, स्थायी पंजीकरण समाप्त करना तथा फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। कानून का भय पैदा होगा तभी ऐसे अपराधों पर अंकुश लग सकेगा।
भारत में पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) कानून मौजूद है, लेकिन केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है। गुप्त जांच दल, नियमित निरीक्षण, संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी तथा शिकायतकर्ताओं को सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना होगा।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना केवल नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे जनआंदोलन का रूप देना होगा। स्कूलों, महाविद्यालयों, ग्राम सभाओं, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और मीडिया को मिलकर व्यापक जनजागरण अभियान चलाना होगा। बेटी के जन्म को उत्सव और सम्मान का विषय बनाने वाली संस्कृति विकसित करनी होगी।
सरकार को भी इस विषय को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए प्रभावी योजनाएँ लागू की जाएँगी तो बेटा-बेटी के बीच का भेदभाव स्वतः कम होगा।
हाल ही में उजागर हुई घटनाएँ समाज और चिकित्सा क्षेत्र दोनों के लिए गंभीर चेतावनी हैं। इन घटनाओं से प्रत्येक डॉक्टर, प्रत्येक अभिभावक और प्रत्येक नागरिक को सीख लेनी चाहिए। क्योंकि गर्भ में एक बेटी की मृत्यु केवल एक आंकड़ा नहीं होती, बल्कि वह मानवता की अंतरात्मा पर अंकित एक गहरा घाव होती है।
स्त्री भ्रूण हत्या कब रुकेगी, यह प्रश्न आज भी बेचैन करता है।
इसका उत्तर केवल न्यायालयों, पुलिस थानों या सरकारी कार्यालयों में नहीं है। इसका उत्तर हमारे अपने मन में है। जिस दिन बेटा और बेटी के बीच का भेद समाप्त होगा, जिस दिन बेटी का जन्म उत्सव का कारण बनेगा, उसी दिन गर्भ में दबाई जा रही चीखें भी थम जाएँगी। क्योंकि बेटी बचेगी, तभी परिवार बचेगा, समाज बचेगा और राष्ट्र का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
- दिवाकर मोहोड़
नागपुर, महाराष्ट्र