बढ़ते तापमान से जीव सृष्टि अलर्ट मोड पर
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विश्व पर्यावरण दिवस विशेष - 05 जून
जीव सृष्टि के लिए केवल एकमात्र आधार पेड़ है, पेड़ खत्म मतलब पृथ्वी से जीवन समाप्त। प्रकृति का एकदम सरल नियम है कि, पेड़ हमें बचाते है, हमें उन्हें बचाना हैं। अगर हम प्रकृति की रक्षा में लिए 1 प्रतिशत भी योगदान देते है तो उसके तुलना में प्रकृति 100 प्रतिशत समृद्धि हमें लौटाती हैं। कोरोना काल में हम सबने देखा की, जब प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप थम गया था, तब प्रकृति तेजी से अपनेआप को समृद्ध कर रही थी। आज विडंबना है कि, जो निस्वार्थ समृद्ध पेड़ दशकों तक माँ की तरह हमें अपने आँचल की छांव में धूप से बचाता था, फल-फूल देता था, पंछियों का रैनबसेरा हुआ करता था, बरसात में भूमि के कटाव को रोकता था, मनुष्य के लिए जहरीली कार्बनडाय ऑक्साइड को खुद अवशोषित करके प्राणवायु ऑक्सीज़न हमें देता था। वातावरण में नमी और तापमान को नियंत्रित कर प्राकृतिक स्त्रोतों को समृद्ध बनाने में मुख्य भूमिका निभाता था। आज उसी पेड़ को काटने पर लोगों को जरा भी दुःख नहीं होता, जबकि हमारे पुरे जीवन और स्वास्थ्य पर इसका गंभीर परिणाम हो रहा है, क्या हम इतने गिरे हुए स्वार्थी लोग है कि, जो हमें जीवन देगा उसकी जान हम ही लेंगे।
आज प्रकृति में बदलते वातावरण की चोट हम सबको झेलनी पड़ रही है, स्वार्थी लोगों की गलत नीतियों ने संपूर्ण पर्यावरण में जहर घोल दिया हैं। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और जंगल कटाई ने पृथ्वी पर तापमान बढ़ाया है, जिसके कारण प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियों में बेतहाशा वृद्धि हो रही हैं। प्रदूषण लगातार बढ़ रहा, सड़के आग की भट्टी की तरह महसूस हो रही है और भूजल स्तर तेजी से गिर रहा हैं। खाद्यान्नों में लगातार बढ़ती घातक रासायनिक समृद्धता लोगों को मौत के मुंहाने पर धकेल रही हैं। एक दशक पहले तक जब धूप में घूमते थे, बच्चे धूप में खेलते थे, तो सिर्फ गर्मी महसूस होती थी, खेलते-खेलते किसी पेड़ के छांव में भी बैठ जाएं तो बड़ी ठंडक महसूस होती थी। लेकिन अब तो यह धूप जहरीली हो चुकी है, शरीर को तपाने के साथ उबालती, बीमार भी करती हैं। शहरों के कॉन्क्रीट के जंगल में घने छायादार वृक्ष का दिखना भी दुर्लभ होता जा रहा हैं।
लू से मरनेवालों की संख्या साल दर साल बढ़ती ही जा रही है, सबसे ज़्यादा असर गरीबों, बुज़ुर्गों, बच्चों और अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों पर पड़ता है, क्योंकि जीवन यापन के लिए उनका संघर्ष अत्यधिक कष्टदायक होता हैं। सीईईडब्ल्यू के अनुसार, निर्माणकार्य मज़दूरों, गिग वर्कर्स और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों जैसे कमज़ोर तबकों को गर्मी के तनाव का सबसे ज़्यादा सामना करना पड़ता हैं। गरीबों को इस गर्मी में भी दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहत करने पर मजबूर होना पड़ता है, उनकी आमदनी और उत्पादकता दोनों गिरती हैं। गर्मी के कारण 2030 तक जीडीपी में 4.5 प्रतिशत तक की संभावित गिरावट आ सकती है, गर्मी के कारण फसलों को नुकसान और खाद्य सुरक्षा को खतरा हो सकता हैं। 'द लैंसेट' में 2024 में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, लू के दौरान काम करने की क्षमता कम होने से हर साल लगभग 194 अरब डॉलर की आमदनी का नुकसान होता है, इस सदी के आखिर तक पूरे भारत में गर्मियों में चलने वाली लू की घटनाएं 300 से 400 फीसदी तक बढ़ सकती हैं।
गर्मियों में भूजल का स्तर लगातार नीचे गिरने के कारण बहुत से ग्रामीणों और दूर-दराज क्षेत्र के रहवासियों को पानी के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ रहा है, अनेक बार सोशल मीडिया पर इससे संबंधित वीडियो वायरल होते है, जिसमे हम देखते है कि छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक थोडेसे पानी के लिए रोजाना कई किलोमीटर दूर तक पैदल चलते है, जान जोखिम में डालकर 50-60 फीट नीचे गहरे गड्ढे में उतरकर दूषित जल पिने के लिए बर्तनों में भरते हैं। जीवनावश्यक जल के लिए ऐसा संघर्ष, मजबूरी देखकर बहुत दुःख होता हैं। प्रकृति ने हर एक के लिए शुद्ध जल, हवा, पोषक खाद्य की सुविधा की है, परंतु प्रकृति का संतुलन बिगाड़कर स्वार्थी मनुष्य ने समस्त जीवसृष्टि के लिए खतरा पैदा किया हैं। लोगों के ये हाल है तो, इस बढ़ते तापमान में जंगलों में बेजुबान वन्य पशुओं के कितने बुरे हालात होते होंगे।
भौगोलिक रूप से हमारा देश उष्ण माना जाता है, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ने से वातावरण में गर्मी बढ़ी है, इससे मूल तापमान लगातार बढ़ता जाता है, प्राकृतिक हरियाली और प्राकृतिक ठंडक देने वाले संसाधन तेजी से खत्म हो रहे हैं। तेज़ी से फैलते शहर प्राकृतिक नज़ारों की जगह कंक्रीट और काँच की इमारतें खड़ी हुयी, ये दिन में गर्मी सोखकर रात में धीरे-धीरे उसे बाहर निकालती हैं, जिससे सूरज डूबने के बाद भी शहरों का तापमान कम नहीं हो पाता। विकास के लिए शहरों के आसपास के सभी गांवों से उपजाऊ भूमि और खेती पर इमारतें बन रही हैं। यूनाइटेड नेशंस के फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन के अनुसार, दुनिया भर में हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल खत्म हो जाते है, यह हर 12 महीने में आइसलैंड या पुर्तगाल के बराबर एरिया को साफ़ करने के बराबर हैं। ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार, भारत में हर साल खेती, वनों की कटाई और बुनियादी ढांचे का विकास की वजह से 1,00,000 हेक्टेयर से ज़्यादा प्राकृतिक जंगल और वृक्ष आवरण खत्म हो जाता हैं। मिनिस्ट्री ऑफ़ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज के अनुसार, विकास प्रोजेक्ट्स के लिए सरकार की इजाज़त से हर साल लगभग 20 से 30 लाख पेड़ काटे जाते हैं।
1990 और 2000 के बीच भारत में 384,000 हेक्टेयर जंगल कम हुए, लेकिन 2015 और 2020 के बीच यह आंकड़ा बढ़कर 668,400 हेक्टेयर हो गया। यूनाइटेड किंगडम की एक वेबसाइट, यूटिलिटी बिडर, जो एनर्जी और यूटिलिटी कॉस्ट की तुलना करती है, की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में भारत ब्राज़ील के बाद दूसरे नंबर पर है, जहाँ इन सालों में औसतन 668,400 हेक्टेयर जंगल काटे गए। रिपोर्ट में आगे बताया गया कि जहाँ ब्राज़ील ने 2015 और 2020 के बीच 2,559,100 हेक्टेयर और इंडोनेशिया ने इसी समय में 1,876,000 हेक्टेयर जंगल काटे, वहीं भारत के आंकड़े काफी बढ़ गए है, 'डाउन टू अर्थ' ने भी यह खबर प्रकाशित की थी। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी बॉम्बे और डीम्ड यूनिवर्सिटी सस्त्रा के अनुसंधानकर्ताओं की एक नये अध्ययन से पता चला है कि 2015 और 2019 के बीच भारत के जंगल वनक्षेत्र में काफ़ी गिरावट आयी हैं। इन वर्षों में भारत में 18 वर्ग किलोमीटर जंगल वनक्षेत्र खत्म हुआ, जबकि इसके मुकाबले केवल 1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा।
यह बेहद चिंताजनक रेश्यो है जो भारत के वन पारिस्थितिकी तंत्र में गंभीर ‘विखंडन संकट’ को दिखाता हैं। जबकि भारत सरकार के प्रमुख नोडल एजेंसी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के अनुसार, भारत नेट सालाना वन क्षेत्र लाभ के मामले में दुनिया भर में तीसरा स्थान बनाए हुए है। वन हानि की वार्षिक दर 10.7 मिलियन हेक्टेयर (1990–2000) से गिरकर 4.12 मिलियन हेक्टेयर (2015–2025) हो गई।
हमसे अच्छे तो जंगली जीव है, जो अपने प्राकृतिक अधिवास को बचाने और उन्हें समृद्ध बनाने में प्रकृति की सही मायने में रक्षा करते हैं। पेड़ों से जंगल समृद्ध होते है, जंगल से शुद्ध पानी के स्त्रोत समृद्ध, शुद्ध प्राणवायु समृद्ध, तापमान नियत्रण, जंगल में वन्यजीव समृद्ध, जीवों में खाद्यश्रृंखला सुचारु रूप में चलती है, वन्यजीवों और मानवीय संघर्ष में कमी होती है, प्रदुषण में कमी आती है, बीमारियां कम होकर मानवीय स्वास्थ्य मजबूत होता हैं। ऋतुओं का चक्र तय समय पर ठीक ढंग से कार्यान्वित होता है, फसलें लहलहाती है, प्राकृतिक आपदाओं में कमी आती है, प्रत्येक नागरिक तक खाद्य सुरक्षा की नींव मजबूत बनाने में सहयोग मिलता हैं। मानवीय जरूरतों की योग्य मात्रा में पूर्ति होती है, अमीरी-गरीबी के बीच की खाई पाटने में मदद मिलती हैं। महंगाई नियंत्रण में लाने में सहायता मिलती है और तब देश खुशहाल और सही मायने में विकसित होता हैं।
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