मानवीय संवेदनाओं का नाम ही कानून है : ओ.डी. जैन
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नागपुर। लोकतंत्र, न्यायिक व्यवस्था विषय पर नागपुर वैचारिक मंच द्वारा आयोजित चर्चा करते हुए वरिष्ठ संपादक पत्रकार एस. एन. विनोद ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर कहा न्यायपालिका की निष्ठा और स्वतंत्रता पर आज प्रश्न खड़े हो रहे हैं। उन्होंने एक पुराना नागपुर का दोहरे हत्या के प्रकरण पर जो निर्णय हुआ और उनके द्वारा दिया शीर्षक फैसला हुआ न्याय नहीं को आज भी सार्थक देख रहे हैं। अतः लोकतंत्र में जनता के जवाब के साथ न्यायपालिका में सुपात्र ही आयें ,फर्जी नहीं।
वरिष्ठ विधि तज्ञ ओ.डी. जैन ने मानव की तीन प्रवृत्ति सात्विक, राजसी, तामसी का हवाला देते हुए नैतिकता के वातावरण के साथ सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना है कि कानून मानवीय संवेदनाओं का नाम ही तो है ।
पी आर ओ एस. पी. सिंह ने व्यक्तिगत घटक और एफ आई आर के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाए।
वरिष्ठ कवि डॉ सागर खादीवाला ने भूतपूर्व जजों को पुरस्कृत करने के साथ, लोकतंत्र में पनपत्ति तानाशाही पर प्रश्न उठाए। आयुर्वेदाचार्य डॉ गोविंद प्रसाद उपाध्याय ने लोकतंत्र में परिवर्तन की दस्तक के साथ न्यायपालिका की जड़ों में काकरोच ना पैदा हों, ऐसी आशा व्यक्त की। पत्रकार व्यंग्य कवि टीकाराम साहू आजाद ने लोकतंत्र के चार स्तंभों में से दो तो ढह गए। बचे लोकतंत्र और पत्रकारिता के स्तंभ जनता के विश्वास पर अब खरे नहीं उतर रहे।
कथाकार चिंतक नरेंद्र परिहार ने न्यायपालिका के प्रकरणों को धाराओं आधारित चार्ज सीट और प्राप्त लिखित गवाही को स्वीकार कर निर्धारित समय में निर्णय की आवश्यकता पर बल दिया । प्रो. नीरज व्यास ने न्यायाधीश की चयन प्रक्रिया को ही गलत ठहरा, सुधार की आवश्यकता है कहा। वरिष्ठ अधिकारी अनिल त्रिपाठी ने प्रचलित लोकतांत्रिक लोकोक्ति लोकोक्ति सौ गुनहगार छूट जाए पर एक निर्दोष की बली ना चढ़े के साथ अधिक से अधिक लोक अदालतों की व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।
अग्र चिंतन के प्रकाशक, संपादक दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने समाज में वर्णित चारों स्तंभों के दुख व्यक्त कर, अभी भी न्याय व्यवस्था पर लोक विश्वास की धारणा जीवित है कहा। आगे उन्होंने विदर्भ वादि नेता हरि कृष्ण जी अग्रवाल के केस में स्व भाषा में पैरवी और चार्ज सीट के आवेदन को सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रथम स्वीकार्यता का मसला उठा ,उम्मीद पर लोक भावनाका जिक्र किया।
वरिष्ठ साहित्यकार धृति बेडेकर ने कॉलखंडो के इतिहास के साथ कहा सत्ता की ताकत न्याय स्वयं की प्रणाली विकसित कर स्वयं करती है ।
वरिष्ठ चिंतक व साहित्यकार इंदिरा किसलय ने चीफ जस्टिस की टिप्पणी (काकरोच वाली) और तमिलनाडु के जज की टिप्पणी का मसला उठा पूछा लोकतंत्र में न्याय निष्पक्ष और स्वतंत्र होगा कि नहीं। ऐसी अविश्वास की भावना प्रसारित हो रही है। जनता स्वतंत्र मत व्यक्त कर सके यह सुनिश्चित हो। न्यायपालिका में न्यायाधीश महिलाओं का प्रतिनिधित्व और बढ़ाया जाना चाहिए और न्याय वादी की भाषा में निर्णय होना चाहिए।
संपादक, पत्रकार कृष्ण नागपाल ने न्याय व्यवस्था को दौलतमंद की तरफ झुकाव रखते महसूस किया। साथ ही कई वर्षों बाद बेगुनाह का प्रमाण पत्र प्राप्त करने वालों को देख युवा भ्रमित और आक्रोशित हो रहे हैं। वरिष्ठ रेल अधिकारी डॉ. पारसनाथ शर्मा ने लोकतंत्र के चारों स्तंभ की निष्पक्षता और स्वतंत्रता की आवश्यकता पर बल दिया । वरिष्ठ संपादक, पत्रकार और साहित्यकार नीरज श्रीवास्तव ने विधि संवत निर्णय की पैरवी करते हुए कहा, लोकतंत्र विधि और कानून दोनों अलग-अलग मसले हैं जिनका गलत इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। कानूनी निर्णय जनता के बीच सड़क पर नहीं, न्यायपालिका की चौखट पर ही होने चाहिए । यह एक स्वस्थ प्रक्रिया है।
कार्यक्रम संयोजक और व्यंग्य शिल्पी राजेंद्र पटोरिया ने न्याय व्यवस्था तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामजस्य की आवश्यकता पर बल दिया। आज लोकतंत्र के चारों स्तंभ की रीढ़ की हड्डी कमजोर हो रही है, जिसे सुपात्र न्यायधीश चयन प्रक्रिया में सुधार के साथ सुदृढ़ किया जा सकता है। व्यंग्यकार सुदर्शन चक्रधर ने भी अपना मत व्यक्त किया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना और संचालन राजेंद्र पटोरिया ने किया और आभार टीकाराम साहू ने माना। जल और जीवन 14 जून 2026 का विषय तय किया गया ।
