अलविदा 'तीजन माई'
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ठेट छत्तीसगढ़ी भाषा में हमारे छत्तीसगढ़ की पंडवानी कला को हमारे पड़ोसी जिले दुर्ग के अटारी गांव से वैश्विक मंच पर पहुंचाने वाली लोक गायिका पद्मश्री पद्मभूषण, पद्म विभूषण डाक्टर तीजन बाई (मेरे लिए माई) अब हमारे बीच नहीं रहीं. उन्होंने मेरे गृह शहर और हमारे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एम्स में अंतिम सांसें लीं. विष्णु देव साय भाई साहब के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ तीजन माई को अंतिम विदाई दी. और इसी के साथ लोक गायन के एक युग की समाप्ति हो गई.
बतौर वरिष्ठ पत्रकार तीजन माई से मुझे तीन बार नागपुर में हुए कार्यक्रमों में मिलने और उनके जीवन को समझने का अवसर मिला. जब मैं पहली बार उनसे मिला था और चरण स्पर्श कर उन्हें बताया था कि मैं स्वयं रायपुर का ही हूं तो उन्होंने तपाक से कहा था कि इस नाते तो मैं तुम्हारी माई ( मां ) हुई. तब से मैं उन्हें माई ही संबोधित करता था. बहुत ही मार्मिक और भावुक उतार चढ़ावों से भरा हुआ था तीजन माई का जीवन. उनके जीवन के कुछ यादगार वाकये मैं आप सभी के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं जैसे कि माई ने स्वयं मुझे बताया था.
24 अप्रैल 1956 में दुर्ग के अटारी गांव में जन्मीं तीजन माई ने महज 13 वर्ष में पहली बार चंदखुरी गांव में पंडवानी का सार्वजनिक प्रदर्शन किया और उसके बाद वह पंडवानी में ऐसी रमीं कि अंतिम सांसों तक कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
बांस गीत और धुन मिले थे विरासत में
उनके पिता छुनुक राम बांस बजाते थे और मां सुखवती बांस गीत गाती थीं. घर में 3 बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थीं तीजन माई. हमारे छत्तीसगढ़ में तीन-चार फुट लंबे बांस को बजाते हुए साथ का गायक उसके सुरों पर कहानी कहता जाता है. माई को भी इसी तरह गाना-बजाना विरासत में मिला. हालांकि माई की छोटी दोनों बहनों खेदा और छुटकी औ भाई शेरा ने संगीत का रास्ता कभी नहीं चुना.
खेतों में गाया सुआ गीत
भयंकर गरीबी के कारण माई बचपन से ही खेतों में काम करते हुए करमा, ददरिया, सुआ गीत गाया करतीं थीं और नारियल की शर्त जीता करतीं थीं. घर के दूसरे सदस्यों के साथ खजूर या छीन के पत्तों से चटाइयां और झाड़ू बना कर बेचते और अपना पेट पालते थे. अपनी मां के चाचा बृजलाल पारधी का पंडवानी गायन छुप कर सुना करतीं थीं. इसी तरह महाभारत के सारे प्रसंगों को उन्होंने याद किया.
बालिका विवाह
महज़ 12 वर्ष की आयु में जिनसे उनकी शादी हुई, उसकी दो शादियां पहले ही हो चुकी थीं. घर में झगड़े होते थे. कुछ ही दिनों में पति चौथी पत्नी घर ले आया. माई अपने माता-पिता के घर लौट आईं. बाद में माई ने भी प्रेम विवाह किया. 3 बच्चों के बाद भी जब माई का गाना-बजाना जारी रहा तो पति से झगड़े बढ़ने लगे.
रायपुर में लिया प्रण
माई ने बताया था कि एक बार वे झाड़ू बेचने रायपुर गईं थीं. सारे झाड़ू बिकने के बाद वह फिल्म देखने चलीं गईं. तुलसी-वृंदा का खेल देखने के बाद उन्होंने ने तय किया कि अब वह केवल धार्मिक गाने ही गाएंगी.
भिलाई इस्पात संयंत्र में चतुर्थ श्रेणी कर्मी
अपने लालन-पालन के लिए सांस्कृतिक आयोजनों पर निर्भर रहने वाली तीजन माई को 7 जुलाई 1986 को भारत सरकार के उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र में चतुर्थ श्रेणी कर्मी के तौर पर नौकरी मिली थी. इससे पहले पंडवानी गायिका के रूप में उनकी विश्वविख्यात पहचान हो चुकी थी. चतुर्थ श्रेणी कर्मी के रूप में सेवाएं देते हुए वो इस बात से संतुष्ट थीं कि उन्हें कम से कम स्थाई तौर पर हर माह एक निश्चित धन तो मिलता रहेगा जिससे उनका भरण पोषण होता रहे. वह भिलाई के सेक्टर 1 वाले घर में रहने के दौरान भी पुराने कपड़े और साड़ियों को जोड़ कर अपने नाती-पोते के सोने के लिए सुई-धागे से कथरी सिला करतीं थीं. जब मैंने उनसे पूछा कि दुनिया भर में आपका इतना नाम है, फिर भी भिलाई इस्पात संयंत्र में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी करना, लोगों को पानी पिलाना ठीक लगता है?उन्होंने बहुत ही सरलता से जवाब दिया कि मैं मिठाई खाती हूं, तब भी जली हुई रोटी की याद मुझे हमेशा बनी रहती है.
लगा भीम ने घूंसा जड़ दिया
माई ने हंसते हुए एक मजेदार घटना का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि वो एक गांव में पंडवानी में भीम का प्रसंग गा रही थीं, तभी उनके पति मंच पर चढ़े और उन्हें जमकर घूंसा मार दिया. वो मुस्कुराकर कहती कि पहले लगा कि शायद भीम ने ही घूंसा मारा होगा लेकिन जब गालियां सुनाईं दीं तो समझ में आया, अरे, यह तो मेरा पति है. इस घटना के अगले दिन माई थोड़ा-सा चावल-दाल और अपने दोनों बच्चों को लेकर घर से निकल चंदखुरी गांव के स्कूल पहुंचीं. वहां उन्होंने गांव वालों के सामने पंडवानी गाना शुरू किया. पंडवानी की ख़बर गांव के मालगुज़ार भूषणलाल देशमुख तक पहुंचीं तो उन्होंने 10 रुपये का इनाम दिया, राशन भेजा और तय हुआ कि रात गांव की चौपाल पर पंडवानी होगी.
तंबूरा, ढोलक बजाने वाले और साथ में पंडवानी की कथा में हुंकार भरने वाले रागी उम्मेद सिंह के साथ आधी रात तक पंडवानी का गायन कार्यक्रम चला. माई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, इसलिए उम्मेद उन्हें दिन में पंडवानी के अलग-अलग प्रसंग याद कराते और माई उन्हें याद कर, रात को पंडवानी प्रस्तुत करतीं. जब माई ने चंदखुरी गांव में तीन दिनों का पंडवानी गाया तो लोग चकित रह गए.
दरअसल उस समय में महिला पंडवानी गायिकाएँ केवल बैठकर गा सकती थीं, जिसे " वेदमती शैली " कहा जाता था. इसे मूलतः पुरुषों का ही गायन माना जाता था. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में पंडवानी की पहली महिला कलाकार सुखिया बाई भी जब अपनी प्रस्तुति देती थीं तो वो भी पुरुष वेश में ही मंच पर उतरती थीं.
सुखिया बाई के बाद लक्ष्मी बाई ने महिला वेश में पंडवानी गाना शुरू किया. लेकिन ये सभी वेदमति शैली की ही पंडवानी गाती थीं. तीजन माई ने परंपरा तोड़ी. वो खड़ी होकर " कापालिक शैली " में पंडवानी गाने लगीं, जहां कलाकार अपनी कल्पना से महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करता है. एक बार भोपाल के भारत भवन में जब उनका कार्यक्रम रखा गया, तब उन्हें जाकर पता चला कि वो पंडवानी की कापालिक शैली की गायिका हैं. माई ने अपने संगीतकार तुलसीराम देशमुख को अपना जीवनसाथी बनाया.
प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और भोपाल में उनका कार्यक्रम रखा गया. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निवास से लेकर देश के कई हिस्सों में उनका कार्यक्रम आयोजित किया गया. फिर तय हुआ कि वो हबीब तनवीर के ' नया थियेटर ' के साथ जुड़कर काम करेंगी. ' मिट्टी की गाड़ी ' नाटक के लिए उन्होंने कुछ दिन रिहर्सल भी किया. एक दिन दोनों के बीच कुछ अनबन हुई और उन्होंने तय किया कि वे केवल पंडवानी ही करेंगी, थियेटर नहीं.
पेरिस में भारत महोत्सव से बदली तस्वीर
माई ने बताया कि पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में जब उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया तो उसके बाद उनकी पहचान ही बदल गई. देश विदेश में उन्हें जानने लगे थे. उनकी पहचान ऐसी हो गई थी कि पेरिस के ही एक फैन ने चिट्ठी भेजी और पता लिखा-तीजन बाई, इंडिया. और मज़ेदार बात ये कि वो चिट्ठी सीधे माई तक पहुंच भी गई. उन्होंने फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन जैसे देशों में अपनी पंडवानी की प्रस्तुति दी. 1988 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ' भारत एक खोज ' में भी उन्होंने अपनी प्रस्तुति दी थी.
अब तो सीधे देवलोक ही पहुंचेंगे
अपनी पहली हवाई यात्रा को लेकर पूछे गए सवाल पर मुस्कुराती और आंखें गोल करती हुई माई ने बताया कि पेरिस जाने के लिए पहली बार हवाई जहाज़ में चढ़ीं थीं. जब जहाज़ उड़ा तो आसपास बादलों को देख कर एकबारगी ऐसा लगा कि अब देवलोक की ओर ही प्रस्थान करने वाले हैं. बहुत डरी हुईं भी थीं. सही सलामत पेरिस पहुंचीं तो जान में जान आई. वहां केवल गोरे-गोरे लोगों को देख डर लगा कि पता नहीं ये लोग मेरा गाना सुन-समझ भी पाएंगे या नहीं. लेकिन लोगों ने खूब सुना-देखा और उन्हें खूब मज़ा आया.
कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों ने बढ़ाई शान
तीजन माई को उनकी कला के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. 1988 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. इसके अलावा, उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2007 में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया गया. 2003 में तीजन बाई को बिलासपुर के गुरुघासीदास विश्वविद्यालय ने डी लिट् से सम्मानित किया. 2017 में उन्हें इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ ने भी डी लिट् से सम्मानित किया. कुछ वर्ष पूर्व फ़िल्म अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी आलिया सिद्दीकी ने उन पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की थी. माई को उम्मीद थी कि फ़िल्म जल्दी ही बन जाएगी लेकिन बात बनी नहीं.
पहले दे चुकीं थीं मौत को चकमा
वर्ष 2018 में तीजन माई को दिल का दौरा पड़ा लेकिन इलाज के कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने मौत को चकमा देकर फिर से पंडवानी शुरू कर दी थी.
लेकिन 2023 में बेटे शत्रुघ्न की मौत ने उन्हें तोड़ दिया. एक और बेटे कौशल की पहले ही मौत हो चुकी थी. 3 में से दो बेटों की मौत के बाद जून 2023 में उन्हें पक्षाघात का दौरा पड़ा और उनका स्वास्थ्य गिरता गया. वो बिस्तर पर रहने लगीं, बातों से दूर, स्मृतियों से भी.
प्रशासनिक उदासीनता का शिकार
इतनी प्रसिद्धि के बावजूद माई अपने जीवन में प्रशासनिक उदासीनता का भी शिकार रहीं. पता नहीं किस हरामखोर अधिकारी की वजह से महीनों तक माई की सरकारी पेंशन बंद रही. फिर हमारे जैसे टेढ़े पत्रकारों की पहल पर मीडिया में ख़बर आई तो हड़बड़ी में दोबारा पेंशन शुरू की गई. मैं उस हरामखोर अधिकारी को खोज रहा हूं जिसने नियम बाह्य ढंग से माई की पेंशन बंद की थी.
तो न मिलती सहायता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष 1 नवंबर को छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव पर पहुंच कर जब तीजन माई की अनुपस्थिति का एहसास किया तो उन्हें सरकारी अमले ने बताया कि माई बीमार पड़ीं हैं, इसलिए महोत्सव में नहीं आ पाएंगी. इस जानकारी से व्यथित मोदी जी ने उनका का हाल-चाल जानने के लिए सीधे फ़ोन लगा दिया. फिर सरकारी लापरवाही की सारी पोल पट्टी उनके सामने खुल गई. उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों की क्लास ले ली और माई को हरसंभव सहयोग करने का आदेश दे दिया. मोदी जी के आदेश के बाद ज़िले के कलेक्टर सिर पर पांव रखकर सरपट माई के घर पहुंचे और अगले दिन तीजन माई को रायपुर के एम्स में भर्ती किया गया. कुछ दिन इलाज के बाद वो वापस गांव लौट गईं. लेकिन हालत में बहुत सुधार नहीं हुआ. इसके बाद माई का एक पांव घर पर और एक पांव रायपुर एम्स में ही रहा. और अंततः उन्होंने शनिवार देर रात इस दुनिया को अलविदा कह दिया. जो आवाज़ कभी समूचे महाभारत को जीवंत कर देती थी, अब मौन हो चुकी है. घर वाले बताते हैं कि जीवन के अंतिम दिनों में माई फिर से बचपन में लौट आईं थीं. बच्चों जैसी बातें करती थीं. जैसे जीवन का चक्र पूरा हो गया हो, वही मासूमियत, वही निश्छलता, बस तंबूरा अब निःशब्द पड़ा था.
अलविदा माई... जहां भी रहना हमेशा हम भारतवासियों पर अपना प्यार, स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखियेगा. चरण स्पर्श.
नागपुर, महाराष्ट्र
