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दोस्ती


दोस्ती प्रेम का है प्राकृतिक स्वरूप,
एक दूसरे को रिश्ते में जोड़नेवाला सूत।
फिर वो अकेला नहीं रहता,
दोस्ती में बंधकर हो जाता मजबूत,
प्रकृति उसे देती हर सुविधा,
बस उसे चाहिए मनका मीत।।

जब भी चाहो दिल खोलकर रखदो नहीं रहता अभिमान,
दोस्ती उसी को कहते वही उसकी असली पहचान।।

दोस्ती प्रेम की होती बहुत  नाज़ुक,
झटका ये सहन  नहीं कर पाए।
हल्का झटका लगे जिया पर,
मन चूर चूर हो जाए।।

दोस्ती है मन का मिलन,
पढ़ लो *मिश्र* पहले दिल से यह पाठ।
फिर दोस्त रूपी पुष्प पिरोना,
सुदृढ़ बाॅंधना दोस्ती की ये गाॅंठ।।

- रामनारायण मिश्र
   नागपुर, महाराष्ट्र 
समाचार 7155399713068020107
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