मैं कौन होता हूँ?
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उस पर उँगली उठाने वाला?
जिसने
ब्रह्मांड रचा,
आकाश रचा,
धरती रची,
समुद्र रचे,
पर्वत रचे,
बीज में
पूरा वृक्ष छिपा दिया,
और
मिट्टी में
फिर से जीवन जगा दिया।
जिसने
जन्म बनाया,
मृत्यु बनाई,
विकास बनाया,विनाश बनाया
क्षय बनाया, अक्षय बनाया
और मृत्यु को भी
एक नई शुरुआत बना दिया।
उसके रचे चक्र को
मैं कैसे गलत कह दूँ?
मेरी दृष्टि
एक क्षण तक जाती है,
उसकी दृष्टि
अनंत तक।
मैं आज को देखता हूँ,
वह युगों को देखता है।
जिसे मैं अन्याय समझता हूँ,
हो सकता है
वही किसी
बड़े न्याय की
भूमिका हो।
जिसे मैं अंत मान बैठता हूँ,
वही किसी नई शुरुआत का
पहला कदम हो।
इसलिए
निर्णय देने में
मैं जितनी जल्दी करता हूँ,
उतनी ही जल्दी भ्रम में भी पड़ जाता हूँ।
मेरा अधिकार
निर्णय देना नहीं,
अपने हिस्से का
धर्म निभाना है।
फल का विधान
उसका है,
कर्म का दायित्व
मेरा।
मैं सम्पूर्ण नहीं,
केवल एक अंश हूँ।
और जब
एक अंश
सम्पूर्ण पर
निर्णय सुनाने लगे,
तभी अहंकार जन्म लेता है।
शायद
विनम्रता का
आरंभ
यहीं से होता है-
जब मनुष्य
धीरे से कहता है,
"मैं कौन होता हूँ?"
- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
नागपुर, महाराष्ट्र
