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सावन (श्रावण)

                           

इस वर्ष अगर मलमास के दो ज्येष्ठ महीने न होते तो सावन शुरू होकर अब तक सावन का ग्यारहवां दिन बीत गया होता। हम देखें तो वैसे भी सावन का महीना हिन्दू वर्ष का पांचवा महीना होता है और यह हर साल आता है। इस वर्ष यह छठा महीना होकर आने वाला है। इसे सबसे पवित्र महीना माना जाता है। यह महीना मुख्यरूप से भगवान् शिव की पूजा, भक्ति और व्रतों के लिए जाना जाता है। 

खैर जो भी हो, इस वर्ष भी सावन महीना अगले बीस दिनों के बाद तो आएगा ही। लेकिन अभी तक मौसम जैसा चल रहा है, उसको देखकर लगता है कि अब सावन में भी कोई विशेष दिलचस्पी या उत्साह नहीं है। इतना गर्मी झेलने के बाद सावन आता भी है, तो क्या वह  आनंद दे पायेगा? एक कहावत है कि 'का वर्षा जब कृषि सुखाने'। वही हाल मनुष्य का इस वर्ष की गर्मी और धूप ने कर दिया है। आदमी बढ़ती गर्मी से ऐसे भी अधमरा हो चुका है। लगता है, गर्मी और तापमान का पूरे विश्व पर असर हो रहा है। धीरे धीरे मौसम वैश्विक रूप से बदलता जा रहा है। 

पहले सावन का नाम जेहन में आते ही मन आनंदित हो जाता था,क्योंकि सावन का महीना मधुर मनोहर कहलाता था। आंखों के सामने सावन की हरियाली झलकने लगती थी। सावन की फुहार मन में एक खुशनुमा दृष्य उपस्थित कर देती थी। सावन का पानी पड़ते ही कृषक धान की रोपाई करने लगते थे। धान की रोपनी करते हुए जब युवतियाँ गीत गाती थीं, तो सुनकर मन गदगद हो जाता था। पानी से खेत की क्यारियाँ, नाले, गड़हे, पोखर सब भर जाते थे। सावन की फुहार पड़ते ही मिट्टी से सोंधी सुगंध आने लगती थी। 

एक और बात जो हमलोगों ने देखी है, वह यह की सावन की फुहार के साथ ही धरती के अंदर से बड़े बड़े पीले रंग के मेढ़क  निकल आते थे और गढ़े, नाले, पोखर के किनारे बैठकर अपनी गर्दन फुला फुला कर टर्र् टर्र् की आवाज निकालने लगते थे। शायद यह उनका प्रणय निवेदन होता था जो मादा मेढ़कों को आकर्षित करता था। यह मौसम उनके मिलन और वंशवृद्धि का  हुआ करता था। एक बार सावन-भादों जैसे ही खत्म हुआ, ये पीले मेंढ़क पुनः गायब हो जाते थे, लगता था जैसे वो पुनः धरती में समा गये हों। 

प्रकृति और समय चक्र के अनुसार सावन महीना बर्षा ऋतु के लिए जाना जाता है। इस महीने में झमाझम बारिश और चारों तरफ हरियाली तन और मन दोनों को ही शांति देती है। तब सावन की आहट से ही मौसम खुशनुमा हो जाया करता था। पर अब पहले जैसा सावन कहाँ है। सचमुच अब सब बदल गया है। अब लगता है कि सावन का आना प्रकृति का नियम  मात्र रह गया है। फिर भी हम सब सावन महीने का इंतजार करते रहते हैं। शहर से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में सावन का प्रभाव देखने को मिलता है। इस महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में जितनी भी दूर आपकी नजर जाएगी, हरियाली ही हरियाली नजर आएगी। 
शहर के अलावा हमनें ग्रामीण क्षेत्रों का भी आधुनिक सावन महीना देखा है। शहर में अगर सावन कम बरसा तो, चारों तरफ कींच कींच और अगर सावन खूब बरसा तो सड़कों और गलियों में जल भराव के चलते घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। हरियाली तो कुछ गिने चुने इलाकों में पेड़ों की दिखेगी या फिर र‌ईस लोगों के घरों के गमलों में दिखेगी। 
इस के बिपरित ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी किसानों द्वारा खेतों में रोपे गये धान के पौधों की हरियाली तथा अन्य खरीफ फसलों की हरियाली दिख ही जाएगी। बचे खुचे पेड़ पौधों की हरियाली गांव  को अभी भी खुशनुमा बनाती है। हांलाकि लोगों का शहर की तरफ पलायन कर जाने एवं पेड़ों के कट जाने से इसमें कमी आई है। 
सबसे खास बात जो आज कल ग्रामीण क्षेत्रों में  जो देखने को मिल रहा है वो यह है कि गीध और गौरैया पक्षी जैसे ही, पीले बड़े आकर के मेढ़क अब सावन भादों की बरसात के दिनों में भी दिखाई नहीं पड़ते हैं और न कहीं उनकी टर् टर् की आवाज ही सुनाई पड़ती है अब उन मेढ़कों का कुछ अता पता नहीं लगता है ठीक उसी तरह से वे पक्षी भी ग़ायब हो गए हैं।जिस तरह से गांव  के किसान शहर की ओर पलायन कर गए, लगता है उसी तरह वो पीले मेढ़क भी धरती में समा गए। उन्हें भी शायद यही लगता है कि अब सावन का कोई ठिकाना नहीं, कि वो किस रूप में आएगा। या तो सुखा सावन आयेगा या फिर धुंआधार बर्षा और तूफान वाला सावन आयेगा जो सब कुछ लबालब भरवा कर या फिर सब कुछ बहाकर ले जाएगा। फिर भी गाकर मन को तो बहला ही सकते हैं कि सावन का महिना पवन करे सोर, जीयरा रे झूमे ऐसे जैसे बनमां नाचे मोर।

- रामनारायण मिश्र
   नागपुर, महाराष्ट्र 
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