झोला अभियान
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झोला अभियान : एक थैला नहीं, ज़मीर की आवाज़ और धरती से मोहब्बत का पैग़ाम ‘कभी- कभी एक छोटा-सा झोला, पर्यावरण बचाने पर दिए जाने वाले बड़े-बड़े भाषणों से भी अधिक प्रभाव छोड़ जाता है।’
आज इंसान तरक़्क़ी की नई बुलंदियाँ छू रहा है, मगर उसकी यही तरक़्क़ी कहीं न कहीं धरती की साँसों पर बोझ बनती जा रही है। जिस धरती ने हमें अन्न दिया, जिन नदियों ने हमारी प्यास बुझाई और जिन वृक्षों ने हमें जीवनदायिनी वायु प्रदान की, उन्हीं के प्रति हमारा व्यवहार दिन- प्रतिदिन अधिक लापरवाह होता जा रहा है।
प्लास्टिक की एक साधारण थैली हमें कुछ क्षणों की सुविधा देती है, लेकिन धरती को सदियों की पीड़ा सौंप जाती है। वह उस मेहमान की तरह है, जो कुछ पल ठहरता है, किंतु जाते-जाते घर की सुंदरता और शांति - दोनों छीन लेता है।
आज हमारी नदियाँ जल से अधिक प्लास्टिक के दर्द से भरी दिखाई देती हैं। खेतों की उपजाऊ मिट्टी अपनी उर्वरता खो रही है। बेज़ुबान पशु कूड़े में पड़ी प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं और मौन ही मृत्यु के आगोश में समा जाते हैं। यह दृश्य केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही का दर्पण है।
ऐसे समय में ‘झोला अभियान’ केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि जागृत अंतरात्मा की पुकार बनकर सामने आया है। डॉ. अनुभा पुंडीर के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान हमें भारतीय संस्कृति, सादगी, स्वदेशी और प्रकृति- प्रेम की ओर लौटने का प्रेरक संदेश देता है।
हमारे बुज़ुर्ग जब बाज़ार जाते थे, तो उनके हाथ में कपड़े का झोला होता था। उस झोले में केवल सामान नहीं होता था; उसमें स्वदेशी का स्वाभिमान, सादगी का सौंदर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान भी समाहित होता था। आधुनिकता की चकाचौंध में हमने झोला छोड़ दिया और प्लास्टिक को अपना लिया। परिणाम यह हुआ कि सुविधा तो मिली, किंतु धरती की मुस्कान खो गई।
महाभारत का एक अमर संदेश है-
‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।’
अर्थात् जो व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करें।
यदि हम अपने घर में कूड़ा बिखरा हुआ नहीं देख सकते, तो इस विराट सृष्टिरूपी घर को कूड़े से भरने का हमें क्या अधिकार है?
झोला : वस्तु नहीं, एक विचार
झोला केवल कपड़े का थैला नहीं, बल्कि एक विचार, एक संस्कार और एक ज़िम्मेदारी है।
जब कोई बच्चा झोला लेकर बाज़ार जाता है, तो वह केवल प्लास्टिक से इंकार नहीं करता; वह सुरक्षित भविष्य का संकल्प भी व्यक्त करता है।
जब कोई माँ अपने हाथ में झोला उठाती है, तो वह अपने बच्चों के लिए स्वच्छ हवा, निर्मल जल और स्वस्थ पर्यावरण का स्वप्न सँजोती है।
जब कोई युवा झोला अपनाता है, तो वह धरती के प्रति अपने प्रेम और उत्तरदायित्व का परिचय देता है।
एक छोटी आदत, एक बड़ा परिवर्तन
इतिहास साक्षी है कि बड़े परिवर्तन हमेशा छोटे-छोटे कदमों से आरंभ हुए हैं। महात्मा गांधी का चरखा केवल सूत नहीं कातता था; वह स्वाधीनता की चेतना जगाता था। उसी प्रकार झोला केवल सामान नहीं उठाता, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की चेतना भी जन-जन तक पहुँचाता है।
एक झोला लाखों प्लास्टिक थैलियों का विकल्प बन सकता है। एक परिवार का संकल्प पूरे मोहल्ले की सोच बदल सकता है और एक मोहल्ले की जागृति पूरे नगर की संस्कृति बन सकती है।
वक़्त की पुकार
संत तुकाराम महाराज ने कहा है-
‘वृक्षवल्ली आम्हा सोयरे वनचरे।’
अर्थात् वृक्ष और वन्य जीव हमारे सगे- संबंधी हैं।
यदि हम अपने संबंधियों की रक्षा करते हैं, तो वृक्षों, नदियों और धरती की रक्षा करना भी हमारा नैतिक कर्तव्य है।
आइए, आज यह संकल्प करें-
न हाथ में प्लास्टिक होगा,
न धरती पर उसका बोझ होगा।
हर घर में झोला होगा,
हर दिल में प्रकृति के प्रति प्रेम होगा।
याद रखिए-
कल का इतिहास यह नहीं पूछेगा कि हमने कितनी प्लास्टिक का उपयोग किया था;
वह यह अवश्य पूछेगा कि जब धरती सहायता के लिए पुकार रही थी, तब हमने उसके लिए क्या किया था।
झोला उठाइए, प्लास्टिक छोड़िए;
धरती से रिश्ता जोड़िए, भविष्य सँवारिए।
"एक झोला हाथ में हो,
एक संवेदना दिल में हो,
और एक हरित भविष्य आँखों में हो-
तो समझिए कि झोला अभियान अपने उद्देश्य की ओर सफलतापूर्वक बढ़ रहा है।’
- डॉ. नितीन सिंघवी
पूर्व प्राध्यापक एवं शिक्षाविद्, यवतमाल (महाराष्ट्र)

