सद्भावना

 


       



दीप घरों में नहीं,

दिलों में जलाइये।

अस्पृश्यता ऊंच-नीच,

दिलों से मिटाइये।

दीवार जात पात की,

बढ़कर गिराइये।


अपने पराये सबको,

गले से लगाइये।

इंसानियत का गीत,

बस गुनगुनाइये।

इंसानियत का पाठ,

सभी को पढ़ाइये।


सद्भावना, की ज्योत,

घर-घर जलाइये।

एकता के सुत्र में,

दिलों को मिलाइये।

फिर शौक़ से मेरे मित्र!

दिवाली मनाइये।


- डॉ जमील अंसारी 

   हिंदी, मराठी, उर्दू कवि 

   हास्य व्यंग्य शिल्पी 

   कामठी, नागपुर महाराष्ट्र


लोकप्रिय खबरें

श्री नागपुर गुजराती ब्रह्मसमाज में घट स्थापना

डांगे महिला महाविद्यालय में उद्यमिता प्रकोष्ठ का शुभारंभ

करवा चौथ उत्सव में महिलाओं ने बिखेरे रंग