नज़्म
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है…
हमने सबको दर्द का मारा देखा है…
(1) पानी की समस्या और किसानों का दर्द
तुम ही बोलो, बात नहीं हैरानी की,
घर-घर में आज ज़रूरत है पानी की।
रोज़ किसानों की होती हैं मौतें यहाँ,
कर नहीं सकते बेचारे दर्द बयाँ।
पहले कभी क्या तुमने ऐसा देखा है?
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है…
(2) युवाओं में नशे का बढ़ता प्रचलन
चूर हैं बच्चे आज नशे में एमडी के,
भूल गए हैं अपने घर के ये रास्ते।
अपना सब कुछ खोते हैं तन्हाई में,
माता-पिता अब रोते हैं तन्हाई में।
घर कितना ही हमने उजड़ता देखा है,
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है…
(3) शराब और राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य
बिकती है इस देश में अब सड़कों पर शराब,
इसको पीकर लोग हुए हैं कितने ख़राब।
नेताओं को चिंता नहीं है भारत की,
इनको बस चिंता है अपनी दौलत की।
हमने आँखों से यह तमाशा देखा है,
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है…
(4) किसानों की बदहाल स्थिति
क्या बतलाएँ तुमको किसानों की हालत,
फ़सलें उजड़ गईं, सिर पर नहीं है छत।
घर में नहीं है खाने को एक दाना भी,
सिर पर रखी चट्टान है कर्ज़े की।
खेतों में इनका ख़ून-पसीना देखा है,
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है…
(5) नशीले पदार्थों के कारोबार पर कटाक्ष
सजता है दरबार नशीली चीज़ों का,
होता है व्यापार नशीली चीज़ों का।
हम हैं परेशान, नेता चैन से रहता है,
‘गोल्डी’ भारतवासियों से यह कहता है—
पहले भी क्या ऐसा नेता देखा है?
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है…
समापन
चेहरे पे एक झूठ का पर्दा देखा है,
हमने हर सरकार को नंगा देखा है।
क्या बतलाएँ हमने क्या-क्या देखा है,
हमने सबको दर्द का मारा देखा है…
कवि : डॉ. शांतीलाल कोचर
अंतरराष्ट्रीय कवि
हिंगनघाट
