ध्वनि नियंत्रण हेतु जनचेतना की जरूरत : मनीष सोनी

 



नागपुर। नागपुर वैचारिक मंच द्वारा विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन नागपुर के सभा कक्ष में ‘ध्वनि प्रदूषण’ विषय की परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए नागपुर कारपोरेशन के पी आर ओ व प्रख्यात समाजसेवी मनीष सोनी ने कहा, हम जागरूक बने और स्वयं से शुरुआत कर जागरूकता अभियान चलाएं और कॉरपोरेशन तथा सरकार द्वारा स्थापित पोर्टल noisefree.in का लाभ उठाएं। उन्होंने चर्चा को सार्थक निरूपित कर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और निर्णय का हवाला भी दिया। सूचना और अज्ञानता के कारण जन चेतना की आवश्यकता पर बल दिया।


वरिष्ठ समीक्षक और कथाकार इंदिरा किसलय ने विकास के नए आयाम के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिक्र कर कहा लोग शोर करते हुए कहते हैं, 'मेरी मर्जी'। शोर के कारण अनिद्रा, बढ़ते हुए बी.पी. के साथ मानसिक तनाव तक को देखा गया है। 


प्रो. मधुलता व्यास ने बढ़ते परिवहन से अधिक ध्वनि शोर के कारण को कटु संबोधित कर, लोकतंत्र में नागरिकों को सजग रहना चाहिए और समझाया ध्वनि संरक्षण हेतु नई प्रणाली में एप की जरूरत पर बल दिया। 


वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश शिव ने बताया 1986 में प्रदूषण को लेकर नियम बने, जिसमें 2000 ईस्वी में ध्वनि प्रदूषण को भी शामिल किया गया और आगे उन्होंने कहा, पुलिस प्रशासन काम पूर्ति दस्तक देकर खामोशी ही अख्तियार करती है। 


कवयित्री रूबी दास का मत था ध्वनि खराब चीज नहीं है। उसका दुरुपयोग नुकसान पहुंचाता है। 


वहीं प्रख्यात वरिष्ठ साहित्यकार धृति बेडेकर ने बच्चों के मनोविज्ञान को समझाते हुए कहा, बच्चे कर्कश आवाज की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। यह बच्चों में विकृत मानसिकता का संचार करती है । आगे उन्होंने कहा डाटा प्रोसेसिंग सेंटर में कूलिंग सिस्टम की ध्वनि प्रदूषण के निरंतरता ही घातक है, ऐसे यंत्रों पर ध्वनि नियंत्रण यंत्र लगाए जाने चाहिए । 


मराठी के प्रख्यात कवि बलवंत भोयर ने औद्योगिक घरानों की चिमनियों की कर्कश आवाज जो आसपास के क्षेत्र में नुकसान पहुंचाती थी, समझा कहा आज वहां ध्वनि नियंत्रण यंत्र लगा दिए गए हैं। 


वरिष्ठ लेखिका और समाज सेविका रंजना श्रीवास्तव ने घर के इक्विपमेंट के शोर से स्वयं के द्वारा नियंत्रण की सीख देते हुए, कान के अंदर छोटे से मेकैनिज्म का जिक्र किया। जो अति शोर बर्दाश्त नहीं कर सकता। अतः नियंत्रण जरूरी है, समझाया। 


पत्रकार व्यंग्य कवि टीकाराम साहू आजाद ने अज्ञात की कविता के माध्यम से ध्वनि के गुण दोष बता सुकून के महत्व को समझाया। 


प्रख्यात समाज सेविका नंदिता सोनी ने कहा शोर की तीव्रता व्यक्ति में चिड़चिड़ापन, अशांति का प्रसार करती है। घर के पास पहले डीजे बजाने से परेशानी होती थी और हम घर छोड़ देते थे। परंतु निवेदन करने से मंडप वालों ने डी जे के कर्कश आवाज को बंद भी किया है। 


प्रख्यात समाज सेवी पत्रकार प्रकाश गोविंदवार ने ध्वनि के शोषक पद्धति के प्रकार गिनाये और आवश्यकता समझाई जैसे घर की दीवारों को रफ रखना, रास्तों पर अशोक के वृक्ष लगाना, घर के पुराने पंखों को बदलना और घर में खादी के पर्दे लगाने की सलाह दी और बैटरी पर चलने वाले वाहन इस्तेमाल करें। 


वहीं व्यंग्य कवि और प्रा.नीरज व्यास ने रोज नंगे पांव चलने की प्रक्रिया और गहरी श्वांस लेने से मानसिक संतुलन के धनात्मक असर को समझाया।


वरिष्ठ संयोजिका नीलिमा शुक्ला ने पटाखे और डी जे के शोर से जानवर अनियंत्रित हुए और व्यक्तियों पर उनके प्रहार से आई अपंगता के यथार्थ चित्र को बताया। 


वरिष्ठ संपादक, प्रकाशक पत्रकार कृष्णा नागपाल ने ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण हेतु माध्यमों की भूमिका पर जोर देकर कहा, उन्हें जन चेतना के कार्यों में सह कार्य करना चाहिए और हमें ध्वनि नियंत्रण के लिए स्वयं से शुरुआत करना होगी। 


वहीं वरिष्ठ पत्रकार व भाषा अधिकारी एस. पी. सिंह ने एंबुलेंस के लिए अलग मार्ग व्यवस्था का जिक्र कर कहा, कि वहां हॉर्न बजाने की जरूरत नहीं पड़ती और ध्वनि प्रदूषण नहीं होता। हमें ऐसे मार्ग व्यवस्था के लिए पुलिस कमिश्नर को निवेदन देना चाहिए।


संपादक, लेखक नरेंद्र परिहार ने शोर की आधिकारिक डेसिबल का प्रमाण बता कई अपघातों का विवरण दिया। इन प्रकरणों पर फौजदारी कार्यवाही के केस दर्ज हुए और न्यायालय की प्रक्रिया जारी है। कार्यक्रम की विस्तृत प्रस्तावना मंच के सह संयोजक नरेंद्र परिहार ने रखी और प्रचार प्रमुख टीकाराम साहू आजाद ने आभार माना ।


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