नाज़ुक रिश्ता
अपने ही जब अपनों का साथ
छोड़ दें तो उम्मीद का दामन छोड़ दो।
रिश्तों में यदि पड़ गयी हों दरारें ,
रिश्ता निभ न सके तो उसे, तोड़ दो।
फ़िक्र मत करो अंज़ाम की
साथ चलना न हो मुनासिब तो
उस गली की राह को मोड़ दो।
जिंदगी ज़िंदा दिली का नाम है
हौसलों से परिंदों के पर को नीचोड़ दो।
यदि अंदेशा हो कि दिवार आँगन में खड़ी होगी ही,
तो उठने से पहले, ही उसकी शख्सियत को मरोड़ दो।
क्या पता कब ग़ैर ही अपने बन जायं *मिश्र*
इसलिए प्यार से मिले लोगों से अपनापन जोड़ दो।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र
