आवली का संदेश
दीपों की आवली कहती है,
तम का हर आवरण मिटाओ।
मन के कोने-कोने में,
नेह के दीप जलाओ।
दीपशिखा की स्वर्णिम आभा,
मौन संदेश सुनाती है।
क्रोध की ज्वाला शांत कर,
करुणा की ज्योत जगाती है।
घृणा के काँटे चुनकर मन से,
प्रेम के पुष्प खिलाओ।
हर रूठे चेहरे पर फिर से,
मुस्कानों के दीप जलाओ।
आलोक की स्वर्णिम रेखाएँ,
जीवन-पथ को समझाती हैं।
तकनीकी जग की चकाचौंध में,
मानवता याद दिलाती हैं।
ऊँचाइयों को छूना, लेकिन,
संस्कारों को मत बिसराओ।
स्वार्थ की दीवारें तोड़कर,
सह-अस्तित्व का दीप जलाओ।
दीपों की झिलमिल कहती है,
केवल आँगन मत चमकाओ।
मन में छिपी कालिमा को भी,
सद्भाव के जल से धो जाओ।
बाहर लाख सजें रंगोली,
भीतर प्रेम सजाना है।
अंतरमन के सूनेपन में,
आशा का फूल खिलाना है।
दीपों की माला पुकारे,
रंजिश के बंधन तोड़ो।
बीते कल की कड़वाहट को,
आज प्रेम से छोड़ो।
न कोई छोटा, न कोई पराया,
सबको अपना मानो।
मानवता के इस आँगन में,
अपनत्व के दीप जलाओ।
दीपों की लौ का संदेश है,
जीवन को उजियारा दो।
गिरते हुए विश्वास को फिर,
स्नेह का सहारा दो।
दीप वही जो स्वयं जलकर,
औरों की राह सँवारे।
प्रेम, दया और त्याग की ज्योति,
हर हृदय में उतारे।
दिवाली केवल पर्व नहीं,
यह आत्मजागरण की बेला है।
मन के तम से लड़ने वाला,
यह उज्ज्वल संकल्प अकेला है।
आओ! इस बार दीप जलाएँ,
केवल घर-आँगन में नहीं।
हर हृदय में प्रेम जगाएँ,
केवल त्योहारों में नहीं।
सच्ची दिवाली तो उस दिन होगी,
जब मन से मन का अंधियारा मिट जाएगा।
जब एक दीप से दूसरा दीप जलेगा,
और सारा संसार प्रेम से जगमगाएगा।
- रंजना इंद्रपालसिंह ठाकुर
नागपुर, महाराष्ट्र
