सृजन का मूल है भाव और संवेदना : डॉ. राजेश गर्ग
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नागपुर। सृजन का मूल है भाव और संवेदना। बिना भाव, विचार और संवेदना के साहित्य की रचना संभव नहीं। सामाजिक - सामूहिक चेतना ही हमारी रचनाधर्मिता को उकसाती है, हमारी मनुष्यता को परिपूर्ण करती है। यह बात इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजेश गर्ग ने कही।वे हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में बोल रहे थे।
व्याख्यान का विषय था- भारतीय साहित्य चिंतन। उन्होंने भारतीय साहित्य चिंतन की परम्परा के आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय चिंतकों ने सृजन प्रक्रिया और सृजनानुभूति पर गहराई से विचार किया है। साहित्य के शास्त्रीय लक्षणों का हवाला देते हुए डॉ.गर्ग ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि हमारी परम्परा में साहित्य को जीवन का सबसे अनुपम उपहार कहा गया है। साहित्य का प्रयोजन ही जीवन और सचराचर जगत् का कल्याण रहा है। साहित्य मनुष्य की आत्मा की ध्वनि है। इसीलिए साहित्यशास्त्रियों ने साहित्य चिंतन के अंतर्गत साहित्य की आत्मा की तलाश पर सर्वाधिक बल दिया है।
जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय से आमंत्रित विद्वान डॉ.शशांक शुक्ला ने रस विषयक भारतीय अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह भारतीय ही नहीं, पूरी दुनिया के साहित्य का आधार माना गया है। क्योंकि रस मनुष्य के भाव, विचार और संवेदना का ही नहीं, उसके जीवन का भी मूल जीवद्रव्य है। बिना रस के सृष्टि में किसी भी पदार्थ या व्यक्ति की सत्ता संभव ही नहीं। भारतीय साहित्य शास्त्रियों ने रस की महत्ता को समझते हुए ही उसे साहित्य सृजन और भावन दोनों का आधार माना है।
संस्कृत काव्य शास्त्र के आचार्यों भरतमुनि, भट्टनायक, आनंदवर्धन, अभिनव गुप्त से लेकर हिन्दी के आचार्य शुक्ल, नगेन्द्र, रामविलास शर्मा और पश्चिमी विचारकों अरस्तू, कालरिज, इलियट आदि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रस को किसी न किसी रूप में सभी विद्वानों ने साहित्य का मूल माना है।
अपने प्रास्ताविक उद्बोधन में विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने भारतीय साहित्य चिंतन की परम्परा को समझने पर बल देते हुए कहा कि साहित्य की बुनियादी समझ के लिए यह जरूरी है कि उसके शास्त्रीय पक्षों पर गहराई से विचार किया जाय। भारतीय चिंतकों ने साहित्य सृजन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला है। अतिथि वक्ताओं का परिचय डॉ. सुमित सिंह और प्रा.जागृति सिंह ने दिया तथा आभार प्रदर्शन सहायक प्रोफेसर डॉ. संतोष गिरहे ने किया। कार्यक्रम के सूत्रधार थे प्रा. अशोक मौर्य। इस अवसर पर विद्यार्थियों के प्रश्नों का समाधान भी विद्वान वक्ताओं ने किया।
