अपने दायित्व से विमुख होकर व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता : रमेश सैनी
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नागपुर। व्यंग्यकार को अपने दायित्व से बचकर लिखने की इजाजत व्यंग्य नहीं देता| दायित्व से विमुख होकर व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता| व्यंग्यधारा समूह के मासिक आयोजन ‘इस माह के व्यंग्य’ के अंतर्गत जबलपुर के वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए यह कहा|
व्यंग्यधारा की चौहत्तरवीं (74 वीं) ऑनलाइन वीडियो गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें "इस माह के व्यंग्य" श्रंखला में इस बार सितंबर 2021 माह में प्रकाशित व्यंग्य रचनाओं में से कुछ चयनित रचनाओं पर बातचीत की गई। प्रमुख वक्ता के रूप में श्री भुवनेश्वर उपाध्याय (चेवड़ा,दतिया), श्री सुमित प्रताप सिंह (दिल्ली), डा. महेन्द्र कुमार ठाकुर (रायपुर) और श्री रमेश सैनी (जबलपुर) ने रचनाओं पर अपने विचार रखे|
गोष्ठी की शुरुआत करते हुए व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह ने कहा कि व्यंग्य की भाषा आम आदमी के अनुसार होनी चाहिए। उन्होंने इंदरजीत कौर की रचना 'दही जमाना कला है या विज्ञान' पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि लेखक ने बहुत परिश्रम किया है और निश्चय ही बधाई के हकदार हैं| लेकिन व्यंग्य भाषाई तौर पर उलझ गया है। शरद उपाध्याय के व्यंग्य 'सामाजिक बनो यार' पर चर्चा में कहा कि लेखक ने व्यंग्य के बजाय सामाजिक बने रहने का सुझाव दिया है। व्यंग्यकार का काम व्यंग्य करना है। यह रचना प्रकाशन की सुविधा को ध्यान में रखकर लिखी गई है|
श्री भुवनेश्वर उपाध्याय ने कहा कि व्यंग्य असरदार होने के साथ ही उसमें सरोकार का होना जरूरी है। व्यंग्य की भाषा ऐसी हो कि व्यंग्य बाण छूटे और निशाने पर लगे। व्यंग्य में मानसिकता का महत्व है| उन्होंने रणविजय राव के व्यंग्य 'नशे में कौन नहीं है' पर चर्चा करते हुए कहा कि व्यंग्य को विषयकेंद्रित रखने की अच्छी कोशिश की गई है| हालाँकि यहाँ व्यंजना ज्यादा असरदार नहीं हो पाई है। अभिजीत कुमार दुबे के व्यंग्य 'मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में खोया मध्य वर्ग' पर चर्चा में कहा कि लेखक की दृष्टि आलोचनात्मक है। इस लेख में यदि किसी एक विषय पर लेखक केंद्रित कर पाते तो और बेहतर होता| भाषा में और मेहनत की गुंजाइश है|
व्यंग्यकार डा. महेन्द्र कुमार ठाकुर ने कहा कि व्यंग्यधारा समूह अपनी रचनात्मक गतिविधियों के जरिए व्यंग्य को अपने नवीन प्रयोगों से दिशा देते हुए हम सबको निरंतर समृद्ध कर रहा है। उन्होंने अरुण अर्णव खरे के व्यंग्य 'एजी ओजी लोजी इमोजी' की समीक्षा करते हुए कहा कि यह हास्य प्रधान रचना है, जिसमें व्यंग्य न के बराबर है। अतुल कनक के व्यंग्य 'गर्त प्रधान सड़क करि राखा' पर चर्चा करते हुए इन्होंने कहा कि गड्ढों की विसंगतियों से सकारात्मक चिंतन उपजा है।
गोष्ठी का संचालन करते हुए वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री रमेश सैनी ( जबलपुर ) ने कहा कि व्यंग्यकार अपने दायित्व से कन्नी काट कर नहीं रह सकता। विडंबना यह है कि आज का लेखक बड़ी हड़बड़ी में है। वह आज लिख कर कल छपना चाहता है। संपादक का असर खत्म हो रहा है। वह न पढ़ रहा है, न लिख रहा है। इस स्थिति पर चिंतन की आवश्यकता है। उन्होंने संजीव निगम के व्यंग्य 'साहित्य के साइड इफेक्ट' पर चर्चा करते हुए कहा कि व्यंग्य में पंच नहीं है। कथा के रूप में लिखा गया है।
वीरेंद्र नारायण झा के व्यंग्य 'ए भाई देख के चलो' पर चर्चा में कहा कि व्यंग्य में गड्ढे के माध्यम से देश काल, राजनीति पर कटाक्ष किया गया है। गड्ढा संस्कृति पर रचना में व्यंग्य करते हुए बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था और आंदोलन संभालने में सरकार की विफलता को उजागर किया गया है।
व्यंग्य आलोचक डा. रमेश तिवारी (दिल्ली) ने कहा कि लेखक को अपनी बात सांकेतिक ढंग से कहने की स्वतंत्रता हो, लेकिन स्वछंदता नहीं होनी चाहिए। टेम्परामेंट के साथ ट्रीटमेंट होना चाहिए। व्यंग्य व्यक्ति को दायित्व का बोध कराता है। निर्भय समाज का निर्माण करता है। संवाद के द्वारा व्यंग्य को उत्कृष्टता की ओर ले जा सकते हैं।
वरिष्ठ व्यंग्यकार हरि जोशी (भोपाल) ने कटाक्ष करते हुए कहा कि परसाई की तरह एकाध रचनाकार पिटे ताकि रचना में जान आए। नए रचनाकारों की निरंतरता पर संतोष जताते हुए कहा कि जो निरंतर लिख रहा है उसी के लेखन में गुंजाइश है।
फारुक अफरीदी (जयपुर) ने कहा कि व्यंग्यकार समाज में एक्टिविस्ट की भूमिका निभाता है। अपने विचारों से अन्याय, अत्याचार और विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करता है। व्यंग्यकार को जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाना चाहिए। व्यंग्य में आम आदमी की पीड़ा, ऊर्जा और तड़प होनी चाहिए। यह याद रखना होगा कि व्यंग्यकार सम्मानित व्यक्तित्व है, विशिष्ट नहीं।
ब्रजेश कानूनगो (इंदौर) ने व्यंग्य में चमक पर जोर दिया तो सुधीर कुमार चौधरी (इंदौर) ने इस बात पर चिंता जताई कि आज के व्यंग्य में चेतना और आवश्यक तत्वों का अभाव है। व्यंग्य में व्यंग्य की मूल आत्मा ही नहीं है। उन्होंने व्यंग्यधारा की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से ही बेहतर दृष्टि का विकास होगा। सुनील जैन राही (दिल्ली) ने कहा कि व्यंग्य में ऐसी बात हो जो तिलमिला दे, आदमी को कचोट दे। अनूप शुक्ल (शाहजहांपुर) ने कहा कि सरोकारी व्यंग्य लिखा जा रहा है, लेकिन छप नहीं रहा। अच्छे लेखन के लिए समझ, पक्षधरता, साहित्य और समाज का अध्ययन जरूरी है। तीरथ सिंह खरबंदा (इंदौर) ने इस बात को सिरे से खारिज किया कि अच्छा व्यंग्य नहीं लिखा जा रहा। उन्होंने इसे नकारात्मक सोच करार दिया।
अंत में तकनीकी मार्गदर्शक श्री अरुण अर्णव खरे (बेंगलुरु) ने सभी अतिथियों और सहभागियों का आभार व्यक्त किया ।
व्यंग्यधारा की गोष्ठी में सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ (हैदराबाद), टीकाराम साहू 'आजाद' (नागपुर), मुकेश राठौर (भीकमगाँव मप्र), अभिजित कुमार दुबे (अगरतला),विवेक रंजन श्रीवास्तव, मधु आचार्य आशावादी, सेवाराम त्रिपाठी, श्रीमती रेणु देवपुरा, श्रीमती ललिता जोशी, श्रीमती वीना सिंह, कुमार सुरेश, प्रभाशंकर उपाध्याय,राजशेखर चौबे, हनुमान मुक्त, प्रमोद चमोली, हनुमान प्रसाद मिश्र, जयप्रकाश पाण्डेय, सूर्यदीप कुशवाहा, सौरभ तिवारी, वेदप्रकाश भारद्वाज आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।