कविता अनुभूति भी है और अभिव्यक्ति भी है : डाॅ. सुमा रोडनवर
नागपुर/पुणे। भावनाओं को व्यक्त करने का अद्भुत माध्यम कविता है। अत: कविता अनुभूति भी है और अभिव्यक्ति भी है।इस आशय का प्रतिपादन डाॅ. सुमा टी. रोडनवर, मंगलौर, कर्नाटक ने किया। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ.प्र. के तत्वावधान में मध्य प्रदेश इकाई की ओर से म.प्र. राज्यस्तरीय काव्य गोष्ठी में वे मुख्य अतिथि के रूप में अपना उद्बोधन दे रही थी।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, उ.प्र. के अध्यक्ष डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। डाॅ. सुमा टी. रोडनवर ने आगे कहा कि, कविता कभी मरती नहीं, बल्कि वह प्रासंगिक होती है।कविता राग और आग दोनों भी होती है। उसमें भक्ति, राग, नीति, रीति होती है। कविता से प्रेरणा लेकर ही हम आगे बढते हैं।
विशिष्ट अतिथि ओम प्रकाश त्रिपाठी, सोनभद्र, उ.प्र. ने कहा कि संस्थान ने पूरे विश्व को एक सूत्र में रखने का सफल प्रयास किया है। भारत में कविता का इतिहास व दर्शन बहुत पुराना है।प्रकृति को परिवर्तित करने की अद्भुत क्षमता कविता में होती है। हृदय तल से उपजी भावना ही कविता होती है।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, उ.प्र. के सचिव डाॅ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने प्रस्तावना में संस्थान की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने अध्यक्षीय अपने उद्बोधन में कहा कि कविता की जन्मस्थली सही मायने में भूख, वेदना, दुख और अभावग्रस्त जीवन है। कविता में निहित मुख्य तत्व संवेदना है। अपनी स्वतंत्र विशेषताओं के आधार पर कविता आज साहित्य की महत्वपूर्ण विधा के रूप में पहचानी जा रही है।
काव्य गोष्ठी का सफल व सुंदर संचालन डाॅ.संजीवनी संदिप पाटिल, गडहिंग्लज, कोल्हापुर, महाराष्ट्र ने किया। श्रीमती ज्योति तिवारी ने सरस्वति वंदना प्रस्तुत की तथा डाॅ. वंदना अग्निहोत्री, इंदौर, म.प्र. ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
किव्य गोष्ठी में रचना प्रस्तुत करते हुए श्रीमती कांचन शेंदुर्णीकर, इंदौर ने सुनाया- 'हे सीमा के निर्भीक प्रहरी, शब्दों के प्रहरी का तुझको नमन, हिम्मत, ताकत, शान, सम्मान, धन्य धन्य नाज ए वतन।।'
डाॅ. अंजना चक्रपाणि मिश्र, इंदौर ने अपने प्रेम गीत के माध्यम से व्यक्त किया- 'मेरे दृगों के मध्य बसे, अप्रतिम मूरत साकार हो तुम।हाँ प्यार हो तुम, हाँ प्यार हो तुम।।'
श्रीमती रागिनी स्वर्णकार (शर्मा) इंदौर ने कहा 'ख्वाब पलकों में सुहाने सजाते रहिए,दिल की आवास में आवाज मिलाते रहिए।''रोशनी को न तरसते रह जाए कोई, दीप मोहब्बत के यार जलाते रहिए।'
शैलेंद्र बुधोलिया, दतिया से लिखते हैं - 'अंतर मन की असह्य वेदना को मैंने जाना। व्यथित हृदय के मौन रूदन को मैंने पहचाना।' श्रीमती ज्योति तिवारी, इंदौर ने सुनाया - आज के बच्चे, वे आजकल हमें पढा रहे हैं। श्रीमती मधु टाक, इंदौर से लिखती है, 'अंजान सफर में हर कदम ढूँढ लेती हूँ। सात वचनों में सात जनम ढूँढ लेती हूँ।' डाॅ. वंदना अग्निहोत्री, इंदौर ने सुनाया - जाल मैं कठपुतली, नियंत्रण डोरे बढ गई हैं, जब से निकली कठपुतली घर से, घर की डोरे खिंचती उसे वापस घर की ओर।
डाॅ. सुमा टी. रोडनवार, मंगलौर, कर्नाटक ने प्रस्तुत किया- 'कविता तुलसी का लोकगीत है। सूर की अंधी वात्सल्य भक्ति - दृष्टि, मीरा की प्रेम दीवानगी, कबीरा की फकीरी, दादू व नानक की समाजदृष्टि, रैदास की दैन्य भक्ति है।