आत्मनिर्भर भारत के लिए भारतबोध आवश्यक : प्रो. आर. सर्राजू
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नागपुर। आत्मनिर्भर भारत के लिए भारतबोध आवश्यक है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र को जाने बिना उस राष्ट्र के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। भारतीय साहित्य का अध्ययन करके ही हम भारत को जान सकेंगे। यह बात हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सम कुलपति प्रो. आर. सर्राजू ने हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में कही। ‘भारतीय साहित्य और भारतबोध’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य ज्ञान का व्यापक भंडार है। भारतीय मूल्य को समझने से सृजन चेतना का विकास होता है।
प्रोफेसर आर. सर्राजू ने कहा कि भारतीय विचार दर्शन को पाश्चात्य विद्वानों ने ‘भारतीय साहित्य’ कहा है। भारतीय साहित्य प्रादेशिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय बोध विकसित करने वाला साहित्य है। यह भारतबोध परम्परा से आधुनिकता की ओर प्रस्थान कर रहा है। इसलिए भारतबोध की अवधारणा को हमें समझना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि केवल भौतिक विकास से भारत का विकास सम्भव नहीं है। भारत अध्यात्म, संस्कृति, साहित्य को जन-मन को सींचनेवाली भूमि है। विद्यार्थियों की समझ और उनके वैचारिक दृष्टिकोण के विकास के लिए भारतीय साहित्य का अध्ययन आवश्यक है।
कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए नागपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि भारतीय साहित्य मानवीय चेतना का द्योतक है। मैं कौन हूँ, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर भारतीय साहित्य से प्राप्त होता है। भारतीय अस्मिता की पहचान ही भारतीय साहित्य का लक्ष्य है। इस कार्यक्रम में हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. संतोष गिरहे, डॉ. सुमित सिंह, डॉ. एकादशी जैतवार, प्रा. लखेश्वर चन्द्रवंशी, प्रा. दिलीप गिरहे, प्रा. जागृति सिंह, प्रा. कुंजनलाल लिल्हारे सहित अनेक शोधार्थी तथा विद्यार्थी प्रमुखता से उपस्थित थे। आभासी माध्यम से आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन डॉ. गजानन कदम ने किया।