जीना है तो जी लो
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वो धरती पर आना है।
भले हवा के संग उड़ेगा,
मिट्टी में मिल जाना है।
वो कैसा इन्सान जमीं का,
जो न गगन में उड़ता हो,
जो न कभी उड़ता जीवन में,
अन्त समय उड़ जाना है।
जीने खातिर है ये जीवन,
क्यों मर - मरकर जीना हो,
जीना है तो जी लो प्यारे,
आखिर तो मर जाना है।
सीखो उस किसान से जीना,
मिट्टी में मिल जाता जो,
एक बीज और सौ दाने का,
गणित हमें सुलझाना है।
जीवन ये अनमोल मिला है,
माप तोल कर जीना क्यों,
दो कौड़ी का इसे न करना,
सोने सा कर जाना है।
रखना अपना मन मतवाला,
मस्ती में यदि जीना हो,
दुखियारे इस जग जीवन को,
मस्ती से भर जाना है।
- परमात्मानंद पांडेय 'मतवाला'