सांझा - चूल्हा : अनेकता में एकता को दर्शाता एक अनूठा उपक्रम
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नागपुर। हिंदी महिला समिति का अनेकता में एकता को दर्शाता एक अनूठा व संदेश वाहक कार्यक्रम आनलाइन पर बहुतही खूबसूरती से संस्था की बहनों ने विभिन्न प्रकार का 'हलवा' बनाकर एवं विभिन्न वेशभूषाओ, गीत कविताओं के द्वारा दर्शाकर सबको सम्मोहित कर दिया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि ममता विश्वकर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहीं। इस कार्यक्रम का संयोजन, संचालन संस्था की अध्यक्षा रति चौबे ने किया, गूगल मीट होस्ट रही उपाध्यक्ष रेखा पांडे।
कार्यक्रम को संबोधित करते रति चौबे ने कहा कि हमारा भारत विभिन्न संस्कृतियों का संगम स्थल है, विभिन् व्यंजन, वेशभूषा होने पर भी वह अनेकता होते हुए भी एकता की सौंधी सुगंध बिखेरता है।आज सभी जगह बेटी बचाओ, ऊर्जा बचाओ, प्रदूषण हटाओ, आदि पर हो हल्ला मचा है पर संस्कृति बचाओ पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
हिंदी महिला समिति से 'सांझा चूल्हा' जैसे संदेशवाहक कार्यक्रम कर इसी प्रकार से भारतवासीयो को संदेह दे एकता की 'लौ' जलाने को प्रेरित करने का प्रयास 15 वर्षो से कर रही है। इस बार कोरोना ने ऑनलाइन इस कार्यक्रम को करवाकर ओर विस्तारित किया गया है।
बिहार प्रांत की प्रसिद्ध लोकगीत गायिका जो अब अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है मधुबाला श्रीवास्तव ने 'बेसन हलुवा' बना एक सुंदर बिहारी गीत से सबका मन मोह लिया। रेखा पांडे जो एक कुशल व्यंजनो की पारखी है लिम्का बुक में जिनका नाम रोशन हुआ, ने 'गाजर हलुवा' बना दिल जीता। यूंपी से आई सरोज गर्ग' ने 'गाजर हलुवा' साथ खुद 'सौन्दर्य विशेषज्ञ' है के साथ ब्रजभाषा में गीत गाकर वहां की संस्कृति को दर्शा दिया ,सब मंत्रमुग्ध हो गए।
तभी गुजरात से आकर पंखीडा, पंखीडा अपने मधुर स्वरों में गाकर सारे माहौल को गुजरात की संस्कृति की महक में महकाते हुए 'रवा का हलुवा' दिखा गई उमा हरगन। और फिर आई प्रसिद्ध समाजसेवी व सम्मान प्राप्त कविता परिहार ने मध्यप्रदेश का विभिन्न संस्कृतियों को दर्शाता 'कद्दू का हलुवा' लाकर सबको चकित कर दिया।
तो भला फिर राजस्थान कैसे पीछे रहता, अपनी राजस्थानी वेशभूषा में सजी संवरी ममता शर्मा ने जब 'मूंग - बादाम के हलुवा' की झलक दिखाई तो सही मे मज़ा आ गया। उसी समय पूनम मिश्रा अपनी एक विशेष डिश 'केले का पकवान' बना लाई साथ ही अपनी कविता की चंद पंक्तियां सुना पर्यावरण की याद करा गई -
'पवन क्या भटकी,
मशीनों ने उसे कैद किया,
नीम, बड़, पीपल,को याद किया,
हे सृष्टी इस दुलार ने हमें बिगाड़ दिया।'
सुषमा अग्रवाल मचल पड़ी ले 'मेवों का हलवा' और साथ में बोल पड़ी -
'कब तक खेली जाती रहेगी, यह खून की होली',
देश प्रेम व कोरना पर एक कटाक्ष था।
शीला भार्गव ने अपनी प्रस्तुति में एक मन को मोह लेने वाली कविता बोली सब भावविभोर हुए -
'मुझमें सागर आज खिला है, नदियां के भावों को अपनी काव्यवाणी में इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया की सभी गदगद हो गए।
तभी रश्मी मिश्रा ले आई 'सिगाडे का उपासी हलुवा' और गा बैठी सारे वातावरण को मस्त करता गीत। और फिर दूर देश आस्ट्रेलिया से आ गई अमिता शाह अपने मधुर गीत के साथ। महाराष्ट्र की वेशभूषा में सजी किरण हटवार आई 'आलू हलुवा' के साथ गणेश गीत गाती बड़ी सुंदर लग रही थी, तालियों से सबने स्वागत किया।
अंत मैं रति चौबे ने एक कविता और प्रस्तुत की 'ऐसे स्वप्न मैं क्यूं देखूं जो ना पूरे कर पाऊं' इस प्रकार विभिन्न, हलुवो व संस्कृतियों, के साथ अपने उद्देश्य को कि हलुवा चाहे किसी भी तरह बनाया गया, पर उसकी मिठास एक जैसी ही है। विभिन्नता होते हुए भी को पूर्ण करते अपने कार्यक्रम को गणतंत्र दिवस को समर्पित करते जयहिंद का नारा लगाते समाप्त किया, आभार सरोज गर्ग ने माना।
'मेरी भारत मां की मिट्टी का अंदाज ही निराला है हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सबको अपने आंचल में पाला है'
गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में कविता परिहार ने यह पंक्तियां समर्पित कर जयहिंद का नारा लगा कर कार्यक्रम का समापन किया गया।