मां
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सागर भी तू ही,
तू ही धरती
आकाश भी तू ही।
तू ही बोली
मौन भी तू ही,
स्नेह ममता की
वाणी माँ तू ही।
तू ही असीम
शून्य भी तू ही
कण - कण में समाया
विश्वात्मा तू ही।
प्रेम, धीरज की मूर्ति तू है
कोमल - नीरज
शीतल आंचल भी तू है,
ओ मां
तेरी पूजा
गौरव मेरा
तुझ बिन सूना
जग सारा है।
- डॉ. शिवनारायण आचार्य 'शिव'
नागपुर (महाराष्ट्र)