नेताजी बोस त्याग, शौर्य और साहस के प्रतीक हैं : डाॅ. शहाबुद्दीन शेख
https://www.zeromilepress.com/2022/01/blog-post_722.html
नागपुर/पुणे। आझाद हिंद फौज के संस्थापक और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महनीय भूमिका निभानेवाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस त्याग, शौर्य साहस के प्रतीक हैं। ये विचार राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के राष्ट्रीय मुख्य संयोजक डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे महाराष्ट्र ने व्यक्त किए।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस जन्मदिन के अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना की ओर से आयोजित आभासी गोष्ठी में वे अध्यक्षीय उद्बोधन दे रहे थे। डाॅ.शेख ने आगे कहा कि नेताजी बहुत बडे तपस्वी थे। अपने सैनिकों को उन्होंने कहा था कि "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा।" प्रास्तविक में महाराष्ट्र प्रभारी डाॅ. भरत शेणकर,अकोले ने कहा कि, नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जीवन शौर्य से परिपूर्ण और नाट्यमय रहा है। उनके क्रांतिकारी विचारों की बदौलत ही देश को आजादी मिली है।
मुख्य वक्ता डाॅ. अनुसूया अग्रवाल, महासमुंद, छ.ग. ने कहा कि सुभाषबाबू आज भी देश के युवाओं में जिंदा हैं। नेताजी के आचरण को जीवन में उतारने की आवश्यकता है।
रा.शि. सं.के महासचिव डाॅ. प्रभु चौधरी ने कहा कि भारत को स्वतंत्र कराने का एकमात्र उद्देश्य सुभाष बाबू का था। वे पराक्रम और सूझबूझ से आजादी के आंदोलन में जुटे रहे। मुख्य अतिथि डाॅ. अंजना संधीर, गुजरात ने कहा कि गुलामी की जंजीरों को काटनेवाले नेताजी के विचार सदैव प्रेरणा देते रहेंगे। गोष्ठी का आरंभ डाॅ. सुरेखा मंत्री, यवतमाल ने सरस्वती वंदना से किया। गरिमा गर्ग, पंचकूला, हरियाणा ने स्वागत उद्बोधन दिया तथा संचालन प्रा. रोहिणी डावरे,अकोले, महाराष्ट्र ने किया।
इस अवसर पर काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया।डाॅ. मुक्ता कौशिक, रायपुर ने कविता के माध्यम से सुनाया 'ऐसे माँ भारती के वीर सपूत, नेताजी को बारंबार प्रणाम है।' श्रीमती सपना साहू, इंदौर ने कहा कि 'हमारे चक्षु जब भी आसमाँ की ओर उठे, गर्व से हवाओं में लहराता प्यारा तिरंगा दिखे।' श्रीमती भुवनेश्वरी जायस्वाल, कोरबा, छ.ग. ने कहा कि, खिले एक फूल तो उसके कभी उपवन नहीं बनता, बहती एक नदी का रूप भी सागर नहीं बनता।'
श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने कहा कि ' एहसानमंद रहेगा तुम्हारा भारत भू का कण कण।' श्रीमती स्नेहलता भारती, गाजियाबाद, उ. प्र. ने कहा कि' आ झुका शीश कर लो नमन हम उन्हें देश के ही लिए जो जिये और मरे।' अंत में प्रा. रोहिणी डावरे, अकोले महाराष्ट्र ने 'वतन पर कर दी जिंदगी कुर्बान, रख ली हमेशा अपनी आन, हरदम बढाते देश की शान, वीर जवान ये अपने' इस कविता को प्रस्तुत करते हुए सभी आमंत्रित कवि गण एवं वक्ताओं का आभार ज्ञापन किया।