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बुढ़ापे में आदमी अपने स्वार्थ को लेकर बेहद सतर्क हो जाता है!


मन में आदर्श पालना खतरनाक है। क्योंकि हर आदर्श खण्डित होता है और आदर्श का खण्डित होना अन्ततः मन का टूट जाना होता है। आदर्श बताने वाले प्रौढ़ व बूढ़े लोग खुद व्यवहारिक और अनादर्श तरीके से निजी जीवन बिताने वाले पाये जाते हैं। आदर्शवादी किशोर व नवयुवक परवर्ती जीवन में अपने बुजुर्ग तथाकथित आदर्श व्यक्तित्वों की वास्तविकता देखकर अक्सर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। 

मात्र किशोरावस्था और नवयौवनावस्था में ही व्यक्ति वास्तविक अर्थों में क्रान्तिकारी आदर्श के मानकों के अनुसार चरित्र रख सकता है। बाद की आयु सांसारिक सफलता हेतु मोलभाव की व्यवहारिकता के साथ पटरी बैठाने में ही बीत जाती है। इसलिए कोई वास्तविक क्रान्तिकारी या वास्तविक संन्यासी होगा तो वह प्रौढ़ावस्था के पूर्व की अवस्था में ही होगा। 

प्रौढ़ आदमी स्वभाव से ही बेईमानी के अवगुण से पूर्ण हो जाता है, जिसे वह जीवनभर समझदारी का नाम देकर संसार में चमका चमका कर झूठी ख्याति पैदा करता है। नवयुवक खुले दिमाग का होने से दूसरे की बात सुनने समझने को अक्सर राजी मिलेगा। लेकिन बुजुर्ग आदमी नई बातों के लिए अक्सर बन्द मिलेगा और दूसरे की बात सुनने समझने को तभी राजी होगा जब वह बात उसके मन के मुताबिक हो। अन्यथा वह सुनता ही नहीं। 

किशोरावस्था और उसके तुरन्त बाद की नवयौवनावस्था में ही आदमी ईमानदार व्यक्तित्व वाला हो सकता है। बाद वाला भरोसे के लायक शायद ही रह पाता हो। बुढ़ापे में आदमी अपने स्वार्थ को लेकर बेहद सतर्क हो जाता है और बूढ़ा आदमी सिर्फ अपने महत्व व स्वार्थ को बचाये रखने के लिए कुछ भी कर गुजरने को कटिबद्ध होता है। इसलिए बूढ़ों से बहुत ही सावधान रहने की जरूरत है। 

- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)
लेख 7918559553733091636
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