बसंत का दूसरा नाम संगीतमय प्रकृति होना है : डॉ. विनोद नायक
https://www.zeromilepress.com/2022/02/blog-post_614.html
नागपुर। ॠतु परिवर्तन की बेला अर्थात बसंत आगमन। इस ऋतु में धरती का कण-कण नवसंचार करता है। आम्र में मंजरी आ जाती हैं, पलाश के फूल खिलकर स्वागत करते है, गेहूँ की बलियाँ हवा से बातें करती हैं, सरसों लहलहाकर मन को लुभाती है, सूरजमुखी के फूल सूरज से नजरें मिलाते हैं। यही नही पशु - पक्षी कुनकुनी धूप, हल्की ठण्डी हवा व ॠतु परिवर्तन से हर्षित प्रफुल्लित हो जाते है।
पूरी प्रकृति संगीतमय हो जाती है या यह कहूँ कि बसंत का दूसरा नाम संगीतमय प्रकृति होना है तो गलत नही होगा। उक्त कथन विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उपक्रम साहित्यिकी के संयोजक डॉ. विनोद नायक ने बहारे गज़ल कार्यक्रम में व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता शायर तन्हा नागपुरी ने की। स्वागत संयोजक प्रा. आदेश जैन किया। संचालन संयोजक डॉ. विनोद नायक ने किया।
सर्वप्रथम डॉ भोला सरवर ने 'है आदमी उदास मोहब्बत की आस में, जबकि लगा है मेला नजदीक पास में' गज़ल प्रस्तुत की। इमरान फैज ने 'फलक पे चाँद भी बदली में अपना मुँह छुपाता है, मेरा महबूब बेपर्दा कभी जब छत पर आता है' गज़ल बयां की। मीजान हाशमी ने 'तू करके तबदीर क्या करेगा, है जो भी करना खुदा करेगा' गज़ल प्रस्तुत की। उमर अली अनवर ने 'एहलेफन थे जवाब क्या देते, बहर को हम अहवाब क्या देते' गज़ल बयाँ की। मजहर कुरैशी ने 'मान मनुअल अौर मनुहार नही होता है, हमसे अब ये सबकुछ यार नही होता है' गज़ल बयाँ की। मजीद बेग मुगल शहजाद ने 'मौसमी बहारा खुश्बू बहार दे, कोई तो जाकर दुश्मनों को खबर दे' गजल प्रस्तुत की।
डॉ. विनोद नायक ने 'इक बुलबुला-सी है जिंदगी, प्यार करले मुस्कुरा ले जिंदगी' रचना प्रस्तुत की। प्रा. आदेश जैन ने 'गम का खजाना तेरा भी है, मेरा भी, ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी' गज़ल प्रस्तुत की। शादाब अंजुम ने 'इसको सुनकर तुमने तवज्जो क्यों नहीं दी, मेरी ग़ज़ल क्या चीख़ थी अबला नारी की' गज़ल प्रस्तुत की। गुलाम मोहम्मद खान आलम ने 'हाल ए दिल अपना जमाने को बताऊँ कैसे, अश्के गम अपने मैं पलकों में छुपाऊँ कैसे' गज़ल प्रस्तुत की। तन्हा नागपुरी ने 'मंहगाई में शरीफो को ईमान बेचता हूं, दिल की बात छोड़ो मैं जान बेचता हूं' गजल प्रस्तुत की।
शमशाद शाद ने 'शिकस्ता क़ल्ब है, सारा जहान लेकर भी, सुकूं न आया उसे मेरी जान लेकर भी, ज़माना मुतमइन ऐ शाद क्यूँ नहीं होता, हर एक गाम मेरा इम्तेहान लेकर भी' गज़ल बयाँ की। मणिक राव खोब्रागडे, जयप्रकाश सूर्यवंशी, मजीद बेग मुगल शहजाद, अमानी कुरैशी, तेजिंदर सिह, मणिंद्र सरकार मणि, भगवान शेंडे व रमेश मौंदेकर ने सामाजिक सरोकर की गज़ल प्रस्तुत कर मंत्रमुग्ध कर दिया। आभार शादाब अंजुम ने माना।