एक चिकित्सक की वेदना
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पंखी बन
पर फैलाकर
नीलाभ में
उड़ जाऊं,
दूर खो जाऊं।।
चहकूं वन-वन में
फिरूं कलियों
फूलों के बीच,
देखूं कैसे माली बागों को
पसीने से देता है सींच।
दूर आसमां से देखूं घर दार आंगन,
टहलते सजनी मदमस्त साजन।।
चाय की चुस्की लेती
प्यारी सी माशूका
मंद मुस्काए देख
चेहरा पिया का।।
सुदूर क्षितिज पे
उदित सूरज, पसरे लालिमा,
झूम उठे धरती
और
खिल उठे आसमां।
धरती पे बिखरे
झिलमिलाते ओस
गीत गाते झरने
दिल को छूए जोश।।
किंतु सब कुछ
नहीं इतना सहज,
रंगीन सपने हैं
ये सब महज़।।
वेदना से कातर दुसह्य कराहें
पसीने से लथपथ
सिसकती आहें।।
दो पाटों के बीच
पिसता यह जीवन
एक ओर करम
तो दुसरी ओर
सपनों का भरम।।
कुछ ना समझुं
कुछ ना जानुं,
भ्रमित मन,
बिन पतवार की नाव जैसे,
समय जैसा चाहे
क्रुर खेल खेले मुझसे।
नागपुर, महाराष्ट्र