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'हाई क्यू' पर विवेचनात्मक कार्यशाला संपन्न


नागपुर। महाराष्ट्र भाषा सभा के कार्यालय कक्ष में शनिवार 26 मार्च को आयोजित 'हाई क्यू' कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शशिवर्धन शर्मा 'शैलेश' ने जापान की तीन कतार में वार्णिक छंद की तकनीकी जानकारी देते हुए इसे समय की आवश्यकता निरूपित किया। आगे उन्होंने कहा यह विधा जहां लेखकों को आकर्षित कर रही है वहीं पाठको को रुचिकर लग रही है। 


इस विषय पर विस्तार से इतिहास के साथ शशक्त हाई क्यू प्रस्तुत कर पारसनाथ शर्मा, डॉ. कृष्णकुमार द्विवेदी, नरेंद्र परिहार ने विश्लेषण कर श्रोताओं व लेखकों के हाई क्यू सुन उनका मार्गदर्शन किया। 

कुछ उदाहरण श्रीमती माधुरी मिश्रा - ए मेरी सखी, तुझसे यूं मिली मैं, ज्यों सात सुर। डॉ. शशिवर्धन शर्मा 'शैलेश' - बारिश आई, संग खुशियां लाई, गर्मी भगाई। डॉ. कृष्णकुमार द्विवेदी - प्रेम पराग, मौसम से बरसा, तितली पर। पारसनाथ शर्मा - काले बादल, चमकती बिजली, तेज बारिश। डॉ. विजयकुमार श्रीवास्तव के कई कोतुहल भरे प्रश्नों का समाधान किया गया, उन्होंने इसकी आवश्यकता और श्रोताओं की जरूरत पर मंथन करने का कवियों को अधिक ध्यान देना चाहिए। 

संचालन करते हुए डॉ. तेजवीर सिंह ने चार चार पंकितियो से कविता की बदलती स्थिति और बदलाव की बयार पर कहा - 'जब भी बोलिए, वक्त पर बोलिए, बोलिए तो बोलिए मुक्तसर के लिए।' भारतीय साहित्य बिना काव्य के अधूरा है। अंत में आभार संस्था की तरफ से नरेंद्र परिहार ने व्यक्त किया।
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