महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा में कवि सम्मेलन संपन्न
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नागपुर। महाराष्ट्र भाषा सभा शंकर नगर में 19 मार्च को कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए ज्योति राव लढके ने कवियों को सराहा व अपनी प्रस्तुति में कहा - नक्शा फड़फड़ा उठता है,और राष्ट्रों के आधार बदल जाते हैं।।
डॉ. शशिवर्धन शर्मा ने 'मेरी बस इतनी सीमा है' कविता के माध्यम से नया प्रयोगवादी प्रयोग किया, वहीं रमेश मोंदेकर ने नेताओ पर व्यंग्य 'नेता आरती' के माध्यम से प्रस्तुत किया। वहीं विजय कुमार श्रीवास्तव का स्वर था 'मौसम की अठखेलियां गुमनाम हो गई।' जय प्रकाश सूर्यवंशी ने होली पर जोशीला गीत -'होली आई है , फिर नई उमंग लाई है' सुनाया।
नरेंद्र परिहार ने होली की संस्कृति पर देवर भाभी, साली जीजा के रिश्तों पर चुटकी ली और भोला सरवर के ग़ज़ल के बोल - 'आए थे कल सभा जो, सुल्तान थे सभी। मेरा ख्याल है ये के गुणवान थे सभी।।' तेजवीर सिंह की भावपूर्ण कविता के उपरांत, पारसनाथ शर्मा ने यथार्थपूर्ण कविता की प्रस्तुति में कहा - 'कल हमारा था, आज तुम्हारा है, कल और किसी का होगा।'
कृष्णकुमार द्विवेदी ने उत्कृष्ट व क्षणिकायों से माहौल का दिल जीता और हास्य कविता की प्रस्तुति की - 'फी भरने को नहीं पास में धेला। अब कहां से लाएं पैसा राम।।' संस्था की तरफ से डॉ. शशीवर्धन शर्मा ने आभार माना। प्रस्तावना व सूचनाएं नरेंद्र परिहार ने व्यक्त की।
