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लघुकथाएँ, बहुरंगी होती हैं : डॉ विनोद नायक


विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिकी में आयोजित लघुकथा सम्मेलन

नागपुर। लघुकथाओं का अपना रंग होता है। इनमें प्रेम है, दया है, विश्वास है, करूणा है, शाँति है, सहिष्णुता है, देशभक्ति है अौर न जाने कितने ही रंग हैं। हिन्दी साहित्य के आकाश में लघुकथा का सतरंगी ही नही बल्कि बहुरंगी छटा बिखर रही है। 

यही नही ये रंग समाज के गाल पर, मन पर, खूब जम रहे हैं। उक्त विचार साहित्यिकी के संयोजक डॉ विनोद नायक ने विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बहारे गज़ल कार्यक्रम में व्यक्त किये।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ भोला सरवर ने की। डॉ सरवर ने लघुकथाअों की समीक्षा करते हुए कहा कि- सभी लघुकथाएं सकारात्मक थीं। समाज को प्रेरणा व ऊर्जा प्रदान करने वाली थीं।पाठकों को प्रभावित ही नही, दिशा व दशा बदलने वाली थीं। अतिथि स्वागत तन्हा नागपुरी ने किया। संचालन डॉ विनोद नायक ने किया।

सर्वप्रथम प्रा. मजीद बेग मुगल ने लघुकथा बदला पेश कि "जिसमें एक सरल हृदय महिला को पति व उसकी प्रेमिका जलाकर मार देते हैं। लेकिन प्रेमिका अचानक गैस पर काम करते हुए आग के हवाले हो जाती है तो उन्हे ये बदला लगता है।"

माया शर्मा ने लघुकथा बेटे का कर्तव्य प्रस्तुत की जिसमें बेटी पूरे जीवन पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए अंतिम संस्कार भी पुत्र की भांति ही करते हुए समाज को पुत्री में पुत्र का बोध कराती है। तन्हा नागपुरी ने लघुकथा मौत का दिन मुकर्र है पेश की जिसमें बताया कि मनुष्य कितना भी मनमानी कर ले परंतु निश्चित समय पर हरेक प्राणी की मृत्यु निश्चित है। 

सतीश लाखोटिया ने लघुकथा भ्रम प्रस्तुत की जिसमें नई नवेली दुल्हन के आते ही ससुर की मृत्यु हो जाती है अौर पूरा आरोप दुल्हन पर लगा दिया जाता है। 

डॉ विनोद नायक ने लघुकथा गुलाल में लाल प्रस्तुत की जिसमें एक सैनिक  छुट्टी बीच में छोड़ कर होली के दिन परिवार को छोड़कर युद्ध के लिए रवाना होता है पूरा गाँव रंग अौर गुलाल में सराबोर होता है उस गुलाल में सैनिक की माँ को अपना लाल दिखाई देता है। 

हेमलता मिश्र मानवी ने तान्हा पोला का बैल लघुकथा प्रस्तुत की। जिसमें लकड़ी के बैल के माध्यम से हास्य व प्रेरणा का पुट स्थापित किया। रमेश मौंदेकर ने लघुकथा हत्या व आत्महत्या  प्रस्तुत की जिसमें असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई कि ये आत्महत्या है या हत्या। डॉ भोला सरवर ने लघुकथा नजरिया प्रस्तुत की जिसमें समाज व मनुष्य का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है। 

माणिक खोब्रागडे ने लघुकथा बीच मे झांकाझोल प्रस्तुत की। जिसमें बताया कि भविष्य व भूत तो नही मालूम अौर वर्तमान जीवन ढुलमुल है। विजय मिश्र ने लघुकथा बकरी का स्वभाव व समीर खान पठान ने अकबर - बीरबल का किस्सा पेश किया। आभार हेमलता मिश्र मानवी ने माना।
साहित्य 8930072427041775231
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