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महिला समाज में आपसी तालमेल का अभाव : द्वंद या आंतरिक सुरक्षा


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे-जैसे निकट आता जाता है, महिला सशक्तिकरण एवं महिलाओं के अधिकारों, कर्तव्यों व विभिन्न सामाजिक बुराईयों पर विचार मंथन का वार्षिक अनुष्ठान शुरू हो जाता है। निसन्देह इस अनुष्ठान से परिवार, समाज, देश और दुनिया निरंतर लाभान्वित भी होता रहा है और महिला वर्ग को कई सामाजिक बुराईयों की बेड़ियों से राहत भी मिली है। जिस प्रकार हमारा देश पितृ सत्ता की परंपरा को निभाता रहा है महिलाओं को अपने किसी भी निर्णय में घर के पुरुष की मुहर लगवानी पड़ती है लेकिन इस परंपरा के पालन में कुछ ही परिवारों में पुरूष वर्ग द्वारा दमन की भावना परिलक्षित होती है लेकिन अधिकतर जगह प्रेम व स्नेह का जामा पहने खूबसूरती से संचालित होता रहा है। 

वैसे भी बदलाव धीरे-धीरे ही संभव हो पाता है और हमें अचानक किसी प्रकार के क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। इस तरह परिवार, समाज, देश दुनिया में महिलाओं के जीवन से सम्बंधित विभिन्न मुद्दों में अलग-अलग पदों पर आसीन पुरुष बिरादरी के द्वारा भान्ति-भान्ति के प्रयास किये जा रहें हैं वो तो जो है सो है, पर क्या हम महिलाओं ने एक धारणा "महिला महिला की दुश्मन है" जो कि व्यापक रूप से प्रचलित है, के उन्मूलन के बारे में कभी विचार मंथन किया है?

मैं स्वयं एक महिला हूँ और मैंने भी जाने-अनजाने में इस अवगुण से किसी को निराश किया होगा या किसी का दिल दुखाया होगा लेकिन मैं अंतर्दृष्टि रखते हुए अच्छी तरह से जानती हूँ कि यह एक सच्चाई है जो हर जगह दिखता भी है और अधिकतर महिलायें भुक्तभोगी भी होती हैं। गम्भीरता से सोचा जाये तो यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। इस एक विकार ने हमें अवतल कर रखा है। जबकि हर महिला, शक्ति का रूप है और कहीं एक हो जाएँ तो महान शक्ति का भण्डार हैं व पितृसत्ता हो हिलाने का ताकत रखते हैं। ये बात और है कि हमें ऐसा कुछ नहीं करना है, परम्पराओं की भी अपनी मर्यादाएं होती है उन्हें सद्भावना के साथ बरक़रार रखने में कभी कोई हानि नहीं होती। 

लेकिन गम्भीर समस्या ये है कि सर्वप्रथम  महिलाएं अपने बिरादरी से उस टैग को हटाने का प्रयत्न करें जो हमारे माथे पर एक कलंक की तरह अशोभीत है। इस टैग के कारण महिलाओं की खिल्ली भी उड़ती है क्योंकि बात ही ऐसी है। सदियों से यही देखने, सुनने और अनुभूत करने को मिला कि सचमुच अधिकतर महिलाएं दूसरों की आलोचना करना,  नीचा दिखाना या छिद्रान्वेषण में  लिप्त रहती हैं। वे चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी व उच्च पदों पर आसीन हों, इस विशेषता में धनी पायी जाती हैं। बात कड़वी है और स्वयं को आईना दिखा कर ही हम अपने दम पर सशक्त हो सकते हैं। होता ये है कि आलोचना से दूसरी महिलाओं के अहम को चोट पहुचतीं हैं और चोट खाया हुआ व्यक्ति या तो आलोचक का शत्रु बन जाता है या कटुता की गांठ बाँध लेता है। 

इस प्रकार कटुता से कटुता की उत्पत्ति का यह दुष्चक्र चलता ही रहता है और महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इस इस दुर्भावना की प्रवर्तक हैं। ऐसी महिलाएं स्वयं असुरक्षित महसूस करती हैं और दूसरों की नज़रों में स्वयं विशेष बताने के ध्येय से ऐसे कृत्य को अंजाम देते हैं। इससे महिला बिरादरी की आन्तरिक कमजोरी उजागर होती है और शक्ति स्वरूप देवियों को सशक्तिकरण जैसे मुहीम की आवश्यकता होने लगती है।

अब इस टैग के प्रचलित होने का मूल कारण जो भी हो, या पितृ सत्तात्मक समाज की सोची समझी चाल या षड़यंत्र हो पर महिलाओं को इस बुराई से निजात पाना नितांत आवश्यक है। दूसरी महिलाओं की बुराइयों को नज़रंदाज़ करने या अपने ऊपर हुए किसी दुर्व्यहार को माफ़ करके, भूलने के लिए ऊँचे चरित्र और कठोर आत्म नियंत्रण ज़रूरी है। किसी को सुधारने या आगाह करने के ध्येय से की गयी आलोचना ग्राही को समझ आता है। क्योंकि उसमें मन में अहंकार, द्वेष दुर्भावना का समावेश नहीं होता, इसलिए भाषा भी कटुता रहित होगी और आलोच्य अपमानित, तिरस्कृत नहीं होगा। इस प्रकार धीरे-धीरे महिलायें इस बुराई से मुक्त होकर एक सशक्त माध्यम के रूप में दुनिया के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर सकतीं हैं और पुरूष वर्ग से बराबरी के लिए संघर्ष शायद करना ही न पड़े।

- शशि दीप
विचारक/ द्विभाषी लेखिका
मुंबई, महाराष्ट्र
shashidip2001@gmail.com

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