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साड़ी : भारतीय संस्कृति की पवित्र पहचान


नागपुर। साड़ी हमारी भारतीय संस्कृति की पवित्र पहचान है। भारत देश के अलग अलग राज्यों में, अलग अलग रूप में साड़ी की अपनी एक अनोखी पहचान होती है। भारतीय नारी की सदियों से वस्त्रों में पहली पसंद साड़ी ही रही है। साड़ी नारी के व्यक्तित्व में निखार तो लाती ही है सात ही साड़ी नारी के व्यक्तित्व को गरिमापूर्ण भी बनाती है।


साड़ी में ही ममता का आँचल भी समाया है शायद इसलिए माँ की गरिमामय छवि पूर्णरूप से साड़ी में ही उभरकर नज़र आती है। माँ अर्थात जननी,जगत जननी जो शक्ति और सौम्यता का अद्भुत रूप होती है। साड़ी इसी शक्ति और सौम्यता का प्रतीक है।साड़ी के आँचल का हमारी संस्कृति में बहुत महत्व है इसलिए सदियों से लेकर  आज भी हर शुभ अवसर पर साड़ी पहनने का रिवाज़ है।


आज की आधुनिक युग में, बदलते दौर में साड़ी का उपयोग ना के बराबर होता जा रहा है तथा संपूर्ण भारत देश के बुनकर भाईयों के व्यापार पर इस बदलते दौर का चिंताजनक प्रभाव भी पड़ा है। साड़ी के चलन में कमी आने की चिंता गोवा की श्रीमती विनी टंडन केनी जी के दिमाग में घर कर गई। 

बुनकरों के कला का सम्मान हो तथा साड़ी का वर्चस्व कायम रहे इस बात को नज़र में रखकर,  उन्होंने साड़ी स्पीक नामक वर्चुअल प्लैटफॉर्म बनाया एवम देश विदेश में बसी सभी महिलाओं को प्रोत्साहित किया की साड़ी पहने तथा औरो को पहनने के लिए प्रोत्साहित करे।

आज साड़ी स्पीक देश विदेश में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलतापूर्वक अपने मंतव्य को पूरा करने में सफल है। साड़ी को पहनने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने का सतत कार्य कर रही है तथा मात्र ६ वर्षों में इस समूह से दो लाख साड़ी प्रेमी सखियां जुड़ चुकी है।

नागपुर की साड़ी स्पीक की अध्यक्षा प्रिया सिन्हा भी साड़ी के प्रति समर्पित है तथा इसके प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं।१४ अप्रैल को प्रिया सिन्हा ने सभी साड़ी प्रेमी सखियों के साथ साड़ी स्पीक के ६ वर्ष पूर्ण होने की खुशी में कार्यक्रम 'हमारे बुनकर' का आयोजन किया था। जिसमे सखियां अलग अलग राज्यों की साड़ी में उपस्थित थी।

नागपुर शहर की अलग अलग क्षेत्रों की अनेकों सखियां समाज सेविका, कवयित्रियां लेखिकाएं, कला क्षेत्रो से, शिक्षा श्रेत्रो से सम्मिलित हुई तथा भारत के बुनकरों के बारो में अलग अलग राज्यों के साड़ी के बारे में सार्थक एवम सराहनीय चर्चा हुई। इस कार्यक्रम का संचालन मौसमी भट्टाचार्य ने किया।

इसमे सम्मिलित सखियां कवयित्री पूनम तिवारी हिंदुस्तानी जिन्होंने माँ पर अपनी स्वरचित रचना प्रस्तुत की। प्रोफेसर संगीता पांडे, माया शर्मा, कथक नृत्यांगना आभा आसुदानी, समाज सेविका रमा राठोड़, सायली देशपांडे, सिमरन तिवारी, रूची शुक्ला, वनिता घोड़े, रूपाली ताले, शर्मिला कंदन,अनघा शालपेकर, मा़धवी खरे, सुजाता सिंह, समिधा धोटे, साधना येनुरकर, सुरेखा जोशी, रमोला नाईक, सुमन दास, मंजुषा मकोसे, दीपिका भदौरी, निधि राठी विशेष रूप से उपस्थित थी।
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