ऑनलाइन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उड़ाई कागजी अखबार उद्योग की नींद
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खबरों के लिए बढ़ने लगा मोबाइल, लैपटॉप, टी वी चैनल ऑनलाइन का चलन
नागपुर (आनंदमनोहर जोशी)। आज के आधुनिक युग में लेखनी से लिखी जानेवाली लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी के समय हिंदी में लिखे जानेवाली पत्रकरिता लुप्त होते जा रही है। स्वतंत्रता के समय लेखनी का प्रयोग क्रांतिकारियों द्वारा भारत को आजाद करने के लिए किया जाता था। उस समय ब्रिटिश कानून, ब्रिटिश सरकार लोकमान्य तिलक की कलम से हिल गई थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लेखनी का प्रयोग भारत का विकास करने के लिए किया गया।
भारत के स्वतंत्र होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत का स्वप्न देखा था। अनेक प्रधानमंत्रियों के समय भारत की पत्रकारिता , अखबार उद्योग निरंतर विकसित जरूर हुए। टाईप राइटर, टेलीप्रिंटर से खबरों का आदान प्रदान हुआ करता था। बाद में हाथ से सांचे पर प्लास्टिक, रबर के अक्षर का प्रिंट तैयार करके अखबार प्रिंटिंग की प्लेट भी बनाई जाती थी। लेखनी, कागज के पैड पर लिखने का भी समय आया। जब एक पत्रकार अपनी खबरें दूसरे पत्रकार को कम्प्यूटर पर प्रकाशित करने दिया करते थे। लेकिन कुछ वर्ष से मोबाइल,लैपटॉप के प्रयोग और डिजिटल फोटोग्राफी से लाखों हाथ से लिखनेवाले पत्रकारों पर संकट के बदल छा गए।
वर्तमान समय सूचना प्रौद्योगिकी का है। इस दौरान अब सीधे तौर पर मोबाइल पर टाइप की गई खबरें, डिजिटल फोटो कुछ ही क्षण में कंप्यूटर से अखबार में खबरें प्रकाशनार्थ जाती है। वैसे भी कागज के अखबार दूसरे दिन पहले दिन की खबरें देने लगे है। पिछ्ले एक दशक से पत्रकारिता की शिक्षा लेनेवाले विद्यार्थियों की संख्या 70 प्रतिशत घट गई है। जिसका महत्वपूर्ण कारण पेशेवर पत्रकार गत दो दशक से भविष्य के पत्रकारों को पेशे से आने पर रोकना है। और पत्रकारिता यह सामाजिक क्षेत्र से जुड़ा होने से सही पत्रकारों को स्थान नहीं मिलने पर कक्षा दसवीं के बाद अधिकतर पालक बच्चों को तकनीकी शिक्षा देकर रोजगार की तरफ मुड़ने लगे है।
पत्रकारिता पर वापस भरोसा करने भारत सरकार को प्राथमिक,माध्यमिक, उच्चमाध्यामिक शिक्षा के संस्थान के साथ स्नातक स्तर के नए पाठ्यक्रम रोजगार स्टाइपेंड के साथ तैयार करने होंगे। जिससे कि भारत की पत्रकारिता में सुधार होंगा। आज अनेक विद्यार्थियों को सही समाचार नही बनाना आता है। फलस्वरूप अखबार की खबरों से अखबार मालिकों को अनेक बार प्रतिकूल परिणाम भुगतने पड़े है। वैसे भी अत्याधुनिक समय में अनेक स्थानों पर समय में बदलाव आने से सुबह,दोपहर,शाम और रात्रि चार तरह के समाचार पत्र, साप्ताहिक समाचार पत्र निकलने लगे है। वर्तमान समय में रात्रि 12 बजे की नौकरियों की तरफ झुकाव कम हो रहा है।
रात्रि 12के अखबार के कार्यालयों में नौकरियों के दौरान पत्रकार को अपने निवास , घर जाते जाते सुबह 3 से 3.30 बजे समय हो जाता है। जिससे सभी पालक अपने बच्चों को पत्रकारिता पेशे में नही लाना चाहते। कारण कि भारत जैसे देश में 75 वर्ष बाद भी पत्रकारो को काम करने पर भी पहचान पत्र काम करने वाले स्थानों पर नहीं दिया जाता है। इससे भी पत्रकारों को पुलिस चेकिंग के दौरान भारी दिक्कतें हुई और वर्तमान समय में भी ही रही है। वर्तमान समय के अखबार उद्योग में बिना पत्रकारिता के विद्यार्थियों को फ्रीलांस की बागडोर सौंपी जा रही है। जिससे पत्रकारिता जैसे पेशे पर स्वतंत्रता से अब तक आंच आ रही है।
भारत के सूचना और प्रौद्योगिकी को महामारी के बाद बेरोजगार हुए पत्रकार और परिवारों को राहत देना होंगा। आज सबसे ज्यादा पिछड़ा वर्ग भारत का चौथा स्तंभ खतरे में है। 40 प्रतिशत कागज़ी अखबार उद्योग के खत्म होने के बाद यदि उसे बचाना है तो अखबार के कार्यालय के समय को भी सामान्य समय की स्थिति में लाना होंगा। यह समय की मांग है। अब तो अखबार कार्यालयों में महिलाओं के लिए शाम 6बजे तक का समय निर्धारित हो चुका है। वैसे भी भारत की अधिकांश जनता और पाठक ऑनलाइन मोबाइल, टी वी चैनल, लैपटॉप, दोपहर, शाम, रात्रि अखबार का प्रयोग करने लगे है। ऐसे में अखबार जगत में भी अभूतपूर्व बदलाव हो सकते है। अब मृत्यु संदेश भी समूह में मोबाइल से भेजे जा रहे है। कोरोना महामारी के बाद सभी पालक, सभी विद्यार्थी अपने शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य के प्रति सतर्क हो चुके है। जिससे आनेवाली पीढ़ी में रचनात्मक परिवर्तन होने की प्रबल संभावना है।
