गज़लें दुःख को सुख में परिवर्तित कर देती हैं : डॉ विनोद नायक
साहित्यिकी में बहारे-गज़ल का कुशल आयोजन
नागपुर। जीवन सीधे-सीधे नही चलता। ये नदी के जल की भाँति ढ़ेडा-मेड़ा चलता है। आसमाँ से पहाड़ों पर गिरना, पहाड़ों से झरना बनकर गिरना, फिर किसी नाले, किसी गड्ढे, कितने ही पत्थर व चट्टानों से टकराकर अंत में सागर में लीन हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन बिना संकटों के नही चलता। लेकिन संकटों को भी आनंद में बदलने का गुण सीखना है तो शिव के अवतार श्री हनुमानजी से सीखिए।
भारत रत्न डॉ भीमराव आंबेडकर ने दुःख के पहाड़ों को कैसे सुख में परिवर्तित किया या भगवान महावीर ने अपनी समस्त इंद्रियों को जीत कर सिखलाया हैं। गजलें भी दुःखों को सुख में परिवर्तित करने की क्षमता व सामर्थ्यता रखती हैं। उक्त विचार विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिकी के संयोजक डॉ विनोद नायक ने बहारे - गज़ल कार्यक्रम में व्यक्त किये।
कार्यक्रम की अध्यक्षता शायर तन्हा नागपुरी ने की। स्वागत हेमलता मिश्र 'मानवी'ने किया। संचालन संयोजक डॉ विनोद नायक ने किया। आभार विवेक असरानी ने माना।
शायर डॉ भोला सरवर, तन्हा नागपुरी, माधुरी राऊलकर, हेमलता मिश्र 'मानवी', विवेक असरानी, विष्णु शर्मा 'सुमन', माया शर्मा, स्वाति मिश्रा, विजय मिश्र, देवीदास पाटिल व डॉ विनोद नायक ने अपनी गजलों से समाँ बाँध दिया।

