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शुक्रिया...



एक और रस्म का आगाज़ करते है
गुजिस्ता हुए बरस का शुक्रिया अदा करते हैं।
उन खयालों का जिन्होंने हमें दुखी किया,
और उन वजहों का भी,
जिन्होंने मजबूती से खड़े होने का हौसला दिया।

कुछ खुशी का हिस्सा बने
तो कुछ दर्द की वजह
कुछ ने परवाह कर ,
बेशकीमती बना दिया।

कुछ खुश तो कुछ ना खुश भी
आमद हुई है जिनकी और 
छोड़ कर जाने वाले भी।
कुछ अंजान कुछ परेशान,
किसी को मेरा इंतजार,
किसी का मुझे इंतज़ार।

कुछ सही तो कुछ गलत,
किसी को माफ किया
तो किसी को याद किया।
कुछ रंगीन,कुछ बेरंग
कुछ खयाली से  कुछ बेबाकी से,
आते हुए साल का इस्तकबाल करते है।
चलो शुक्रिया अदा करते है।

- डॉ. तौकीर फातमा ‘अदा’
कटनी, मध्यप्रदेश  

काव्य 1602350061356145158
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