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तब बसंत महकेगा


तुम गेहूं की पकी बालियों सी लहराती जाना,

तुम अमराई के माथे पर, बौर सजाती जाना,

तब कोयल के रस भीने,स्वर से बसंत चहकेगा,

पीली पीली फूली सरसों से बसंत महकेगा।

मैं पलाश के पत्तों पर, श्रंगार-गीत रच दूंगा।

तुम अनब्याही अभिलाषा की, मांग सजाती जाना, 

तुम पंखुड़ियों से क्यारी की, सेज सजाती जाना,

तब तन पर यौवन की केसर,से बसंत महकेगा,

तब कलियों के खुलते घूंघट, से बसंत झांकेगा।

मैं कोंपल की कोरों पर, श्रंगार- गीत रच दूंगा।

तुम पुरवा के पांवों में, झंकार सजाती जाना,

तुम भंवरों के गुंजन में, झपताल सजाती जाना,

तब बंजारिन के इकतारे, से बसंत झनकेगा ,

तब पायलिया की रुन-झुन धुन से बसंत खनकेगा,

मैं मृदंग की थापों पर, श्रंगार-गीत रच दूंगा।

- अनिल भारद्वाज

एडवोकट (हाईकोर्ट - ग्वालियर) मध्य प्रदेश
काव्य 6675820779483568730
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