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एक कदम मंजिल की ओर


देखा है सड़कों को मुस्कुराते हुए,
मंजिल पर अग्रसर कदमों को चूमते,
मंजिल से पहले ही बसेरा बनाया जिन्होंने,
कदम तो वह भी थे जो गर्मजोशी से चले।

कोई मंजिल से पहले लौट गया,
किसी के मंजिल का पता ही बदल गया,
सही मार्गदर्शक के चयन में जो चुका,
उलझकर संकटों में लक्ष से भटक गया।

गुरुबीन ज्ञान कहा से लाऊं,
कहता फिरे कबीरा दोहे में,
बिन पतवार नाव ना चले कोई,
खाए हिंदोले जीवन के समंदर में।

साधा तीर आंखपर मछली के,
दृढ़ था लक्ष अर्जुन का स्वयंवर में,
स्वयं वरते है जब हम लक्ष अपना,
क्यों डिगते है उसिको पाने में?

चलो चले मंजिल की ओर,
थामे अपने संकल्प की डोर,
आ कितनी भी बाधाए मार्ग में,
पाकर रहेंगे जीवन का अंतिम छोर ।

जीवन बहुत ही अनमोल होता है। 
किसी की मुस्कुराहटों पर
जिंदगी न्यौछावर करना भी 
एक बहुत बड़ा सौभाग्य होता है।

- सीए. प्रणवकुमार लीमजा 
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 8726098838864490504
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