हमें फर्क नहीं पड़ता
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हमें फर्क नहीं पड़ता
कि तुम क्या हो
गड़गड़ाहट सी, बलखाती यामनी,
रिमझिम फुहार या तूफानी बरसात
आखिर कौन हो और
कैसी अदा हो
हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।
जानता हूं बहुत बड़ा दिल है तुम्हारा
देखा है धड़कता हमारे अक्स के लिए
आंखों का स्पर्श हो या
घर का फर्श हो
सहमे सहमे से हैं आज भी
बेपरवाह , मदमस्त हमारे मूक संवाद के
क्यों नहीं याद दिलाते तुम्हें
वे तो आज भी तुम्हारे ही पास हैं
हमे अहसास है बैठे होगें रोज
हमें निहारते कुछ उलाहनो को समेटते
हमें फर्क नहीं पड़ता।
कुशन की सलवटें भी हमारी हैं
कतरनों पर लिखावट भी हमारी हैं
तुम्हारे पास हमारी कोई औकात नहीं
रहो उलझनों में कोई बात नहीं
पर तुम एक अमिट हिना हो
हमारी जिंदगी की लौ पर फ़ना हो
हमें फर्क नहीं पड़ता।
कुछ भी कहो तुम्हारा रुतबा तो है
यह भी समझ लो कोई हमसा सगा तो है
हो हयात की अदभुत पहेली क्यों
खुद से खुद ही अलग हो खुदा तो हो
तुम्हें फर्क पड़ता होगा मखमली अंदाज का
हमें फर्क नहीं पड़ता।
- नरेंद्र परिहार ‘एकान्त चिंतन’
नागपुर, महाराष्ट्र
