अमृत, संतुष्टी का
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मोक्ष की प्यास,
करोडों, करोडों को खींच ले गई,
त्रिवेणी संगम, तीर्थराज
प्रयागराज के घाट।
न अपार भीड़ में
कुचले जाने का भय,
न भूख प्यास की चिंता, न मीलों
पैदल चलने की कोई फिक्र।
बस! बस केवल एक, एक ही है,
त्रिवेणी में डुबकी की भूख।
भूख, न केवल वृद्धों ,
बुजुर्गो न युवाओं बालकों ,
न केवल देसी, विदेशियों की भी !
कैसा अद्भुत सम्मेलन?
नागाओं, साधु संतों ऋषि मुनियो,
तपस्वियों ,महात्माओं का,
बडों का, छोटों का,
हर जाति, हर समुदाय का,
अमीरों का, गरीबों का,
शिक्षितों,अशिक्षितों का,
नेताओं अभिनेताओं का,
सबका बस एक ही लक्ष्य
अमृत मंथन से निकला
पा लें अमृत! अमृत!
क्या कहें? ये है भारत की
सामाजिक एकता,समरसता
आस्था विश्वास,सामाजिक चेतनाका
त्रिवेणी संगम, महान पर्व!
इसमें पाया,न पाया मोक्ष
मिला न मिला अमरत्व
पर पाया सबने एक डुबकी से
संतुष्टि का अमृत !
संतुष्टि का अमृत।
- प्रभा मेहता
नागपुर, महाराष्ट्र
