शक्तिशाली शब्द
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चींटियों की पहाड़ियों से उत्पन्न...
बदलाव का सब से बड़ा उदाहरण है
पहले इन का नाम रत्नाकर था
जो छुटपन में जंगल में खो गए थे
और इन का लालनपालन
एक डाकू ने किया
तो ये भी डाकू बने
कईयों को लुटा
कईयों को काट डाला
कई गलत काम किए
उस में कोई अपराधबोध नहीं था
बस पाप के आचरण में
मजा आ रहा था
लेकिन सत्संग के
एक स्पर्श से
इन की सोच बदल गई
किसी एक सही प्रश्न से
इन्हें
उस परम सत्य की अनुभूति हुई
जिस ने
इन्हें ये समझाया कि
पाप में भागीदारी कोई नहीं रखते
जिन्हें हम ‘अपने’ समझते
वे ‘सारे अपने’ भी
भागीदारी नहीं रखते
पाप की कमाई में
मौज मस्ती तो करते है
लेकिन जिम्मेदारी नहीं लेते
वैराग्य का पहला दौर
इन के
बदलाव की शुरुवात थी
इतने बदल गए
की सैकड़ों साल तक
एक ही स्थान पर बैठे रहे
बिना खाए पीए
बिना हिले डुले
इतने स्थिर की चींटियों ने
इनके ऊपर अपने घर बना लिए
पर इन का ध्यान भंग नहीं हुआ
ये तो "मरा मरा" ही बोलते रहे
वो तो भला हो
नारद जी का जिन्हें
ये शब्द मधुर स्वर में
‘राम राम’ सुनाई दिये
इस के बाद तो जैसे
बदलाव का युग आ गया
डाकू से आद्य कवि तक
एक अदभुत यात्रा है जिस की
इतने युगों में कोई मिसाल नहीं है
बदलाव की एक और मिसाल
चाणक्य और चंद्रगुप्त है
एक सरल लेकिन तेजस्वी
सीधे साधे शिक्षक का
एक सत्ता के मद में चूर,
मदिरा की नशा में धुंद
उन्मत्त रईसजादे ने
अपमान किया
तो फिर राज बदल गया
राजा बदल गया
समाज का ढांचा बदल गया
एक राह चलत बालक की
जिंदगी बदल गई
देश का इतिहास बदल गया।
वो शिक्षक अलग थे
उन्हें अपने अमर्याद शक्ति
की कल्पना थी
उन्होंने जो पढ़ा था
उस ज्ञान की
शक्ति का एहसास था
तभी तो एक अकेले
बिना किसी संसाधन के
बिना किसी बसेरे के
साधारण बालक को
चक्रवर्ती सम्राट बनाया
आज के दौर में
टैलेंट एक्विजिशन का बोलबाला है
करोड़ो रूपए खर्चे जाते है
ज्यादा कर के भेड़ बकरियों
समान ऑफर्स दिए जाते है
लेकिन किसी चंद्रगुप्त जैसा टैलेंट
इन्हें मिला
ऐसा पता नहीं पड़ता
बदलाव आम आदमी के
बस का नहीं
ये श्रीमान केजरीवाल जी ने
प्रूव किया
बदलाव करना
और बदलाव टिका के रखने में
जमीन आसमान का फरक है
चंद्रगुप्त सम्राट
बनने के बाद भी
चाणक्य उसी साधारण
कुटी मे ही रहते थे
उन्हों ने शीश महल नहीं बनवाया
वैसे ही व्रतस्थ रहते थे
उतने ही निरीह
उतने ही निरिच्छ
उतने ही ज्ञान में लीन
उतने ही नए नए
परीक्षण में लीन थे
उन की भावना कुछ
मिशन एकांप्लिश्ड वाली थी
दोनों मिसालों में
किसी के शब्दों ने
किसी और की जिंदगी बदल दी
पहले में शब्द थे सुमधुर थे
तो दूसरे में किसी
पिघलाएं शीशे के समान
सम्मान वाले शब्दों ने
रामायण रची जो आजतक
समाज को राह दिखाती है
और दूसरे में अपमान,निर्भर्त्सना, से
भरे शब्द थे तो उन का परिणाम
बदला, युद्ध, संहार, में परिवर्तित हुआ
कहते है कि शब्द
कभी नष्ट नहीं होता
कहते है कि
आज भी श्रीकृष्ण के शब्द
कही गूंजते होंगे,
हमे उन्हें
तलाश करना नहीं आता
उतनी लो फ्रीक्वेंसी या
जिस भी स्थिति या प्रणाली में
वे शब्द आज है
उन्हें निकालना नहीं आता
लेकिन इस का मतलब ये नहीं
की वे शब्द हैं ही नहीं
वाणी से निकले शब्द
बहुत शक्तिशाली होते है
इन्हें सोच समझ कर
उचित सम्मान देकर ही
प्रयोग में लाना चाहिए
इंसान बदल सकता है
लेकिन उस के द्वारा
प्रयोग किए गए शब्द
नहीं बदल सकते
किसी ने क्या खूब कहा है
बदलने के मौके
बहुत मिल जायेंगे,
लेकिन शब्दों को
बदलने के मौके
फिर नही मिलेंगे।
- राजेन्द्र चांदोरकर ‘अनिकेत’
नागपुर, महाराष्ट्र
