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बरकतों का महीना रमज़ान

                             

इस्लाम के पाँच अरकान (स्तंभ) है।कलमा पढ़ना,पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ना,रोज़ा रखना, ज़कात देना एवं हज अदा करना।जो हर मोमिन मुसलमान पर फर्ज़ करार दिए गए है।  
रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नौव्वाँ महीना है।चाँद देखकर रमज़ान के महीने की पहली तारीख से रोज़े शुरू किये जाते है।चाँद देखकर उनतीस या तीस रोज़े रखे जाते हैं।शव्वाल महीने की पहली तारीख को ईदुल फित्र मनाई जाती है।ईद के दिन रोज़ा रखने की सख़्त मनाई है।
      
रमज़ान का महीना बरकतों और फज़ीलतों का महिना है।यह ख़ैरात (दान) करने,नेक अमल,(अच्छे काम),नेकियां  (पुण्य)कमाने,ग़रीबों और मुस्तहिकों (ज़रूरतमंदों)की मदद  करने,दूसरों के दुःख- दर्द को समझ उसे दूर कर इंसानियत की सेवा करने का सबक सिखाने वाला महीना है।इस अमल के लिए सत्तर गुना नेकियों (पुण्य)का सवाब मिलता है।अल्लाह (ईश्वर)की राह में इस महीने में रोज़ा रखने वाले,इबादत करने वाले रोज़दार,नेक एवं नेकी करने वाले बंदे(भक्त)इस पवित्र बरकत वाले महीने में अपने रब(ईश्वर)के बहुत क़रीब होते हैं
        
रोज़ा हर मोमिन मुसलमान पर फ़र्ज़ है। केवल उन्हें छोड़ जो बहुत बीमार है या सफ़र में है।बीमार अगर कुछ दिनों में स्वस्थ हो जाए तो वो साल भर में कभी भी इन रोज़ों को रखे।लेकिन अगर रोज़ा रखने से उस बीमार की बीमारी बढ़ती है या स्वस्थ होने में समय लगता है या बीमारी लाइलाज है ऐसी हालत में रोज़े का फ़ीदिया देना आवश्यक है।
मुसाफ़िर(यात्री) सफ़र(यात्रा)के दौरान छूटे हुए रोजों को साल भर में कभी भी रख सकता है।
  
‘रोज़ा’ शब्द उर्दू में अरबी के सोम शब्द से आया है। जिसका अर्थ जीवन में अपनी इन्द्रियों पर क़ाबू (संयम व नियंत्रण) रखना है।रोज़े की शुरूआत सहरी करने से होती है।सहरी खाना सुन्नत है।तुलु सहर(सूर्योदय)होने से कुछ समय पहले उठकर ताहज्जुद की नमाज़ पढ़कर अन्न, फल,मेवे,दूध,चाय, पानी आदि पीकर 
सहरी का समय ख़त्म होने से पहले कुल्ला करके मुंह साफ़ करते हैं तथा रोज़े की नियत पढ़ते है।तुलु सहर (सूर्योदय)के पहले फ़जर की अज़ान के बाद नमाज़ एवं क़ुरआन की तिलावत की जाती है।रोज़े की हालत में तुलु सहर(सूर्योदय)से तुलु आफ़ताब(सूर्यास्त)तक रोज़दार पर अन्न,फल,मेवे इत्यादि सभी चीजें  खाने की मुमानियत(वर्जित)है।यहाँ तक कि एक बूंद पानी भी वह नहीं पी सकता।

तुलु आफ़ताब (सूर्यास्त)होते-होते 
इफ़तारी के वक़्त एक खजूर और पानी या शरबत से रोज़ा खो लने के बाद आप जो चाहे खा सकते हैं।रोज़े की हालत में खान- पान सहित झूठ बोलना,बुराई(निंदा) करना,बुरा सुनना,बुरा देखना,गाली-गलौज करना,बुरी जगहों पर जाने की सख़्ती से  मनाई है।रोज़े की हालत में यौवन संबंधों से परहेज़ करना अति आवश्यक है।रोज़ा इंसान को खुद पर क़ाबू रखना(आत्मनियंत्रण), सब्र करना(धीरज) रखन,बुराइयों से दूरी और नेक अमल(अच्छे काम)करने की तौफ़ीक(प्रेरणा)देता है।कुल मिलाकर महीने भर के रोज़े मनुष्यों के लिए साल भर नेक इंसान(अच्छा मनुष्य)बने रहने की ट्रेनिंग(अभ्यास)है।हर साल इस ट्रेनिंग को पूरा कर साल भर इसपर अमल किया जाए तो दुनिया अच्छे लोगों का ठिकाना हो जाएगी। 

भूख और प्यास की शिद्दत पर जब हम रोज़े की हालत में क़ाबू पाने की कोशिश करते हैं तब हमें उन भूखे- प्यासे लोगों की तकलीफ़ का एहसास होता है,जिन्हे किसी कारणवश एक समय का भोजन और पीने का पानी भी नसीब नहीं होता।वे कई-कई दिन भूखे प्यासे रह कर गुज़ारते हैं।इस कारण उनकी मृत्यु भी हो जाती है।रोज़ा हमें सिखाता है कि दुनिया में जो भूखे- प्यासे, ग़रीब,मिस्किन लोग हैं उनकी मदद करें। जिससे वे कम से कम भूखो न मरें।इसीलिए बच्चा जब छः साल का होता है तो उसे पहला रोज़ा रखाया जाता है।उसे नए कपड़े पहनाए जाते है। तरह-तरह के पकवान बनाकर रिश्तेदारों-मित्रों और पड़ोसियों को आमंत्रित किया जाता है।उसे पहला रोज़ा रखने पर सब लोग दुआओं के साथ तोहफ़े देते हैं।

कुल मिलाकर यह एक छोटा सा उत्सव होता है।जब बच्चा दिनभर भूख और प्यास की। शिद्दत को महसूस करता है तो उसे भूखे-प्यासे लोगों की तकलीफ़ और दर्द का एहसास होता है। बचपन से ही इस ट्रेनिंग द्वारा उसमें भूखे-प्यासे लोगों की मदद,दान-पुण्य, ख़ैरात,नेकी करने की आदत और जज़्बा पैदा होता है तथा वह  अपनी इन्द्रियों पर क़ाबू रखना सीख एक अच्छा इंसान बनने की तौफ़ीक उसे मिलती है। इससे स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। अल्लाहतआला फ़रमाते हैं कि मुझे अपने वो बंदे (भक्त) बहुतअज़ीज़ (पसंद)है,जो दुनिया में मेरे दीन-हीन बंदों की सेवा करते हैं। 
       
रमज़ान के मुबारक महीने में मुस्लिम भाई-बहन और बच्चे बूढ़े रोज़ा रखकर पांचों वक्त की नमाज़ के साथ आठों पहर अपने गुनाहों(पापों)से तौबा कर अल्लाह से ज़िंदगी की खुशहाली तथा आख़िरत के लिए मग़फिरत(मोक्ष)की दुआ मांगते हैं।रोज़े दार केवल दुनिया को दिखाने रोज़ा नहीं रखता बल्कि वह अपने रब को राज़ी करने के लिए रोज़ा रखता है।क्योंकि वह जानता है कि अगर उसने रोज़े की हालत में लोगों से छिपकर कुछ खा-पी लिया तो वे उसे देख न पाएँगे। बेशक उसका रोज़ा टूट जाएगा।लेकिन अल्लाह की नज़र तो उस पर हमेशा,हर पल रहती है।अगर उसने रोज़े की हालत में कुछ खा-पी लिया तो अल्लाह उससे नाराज़ हो उस पर अज़ाब,( पाप)नाज़िल फ़रमाएंगे। 
          
रमजान में जो लोग साहिबेनिसाब (आर्थिक रूप से सक्षम) हैं उन पर ज़कात देना वाजिब है।यानि जिस इंसान के पास साढ़े सात तोला सोना अथवा बावन तोला चांदी अथवा इसके मूल्य की नक़द रक़म(रुपया)है या इससे अधिक है तो उस मुसलमान पर इसका ढाई फ़ीसद (प्रतिशत) गरीबों, ज़रूरतमंदों में बांटना आवश्यक है।ताकि ज़कात जिन ग़रीबों में बंटती है वे भी ईद की खुशियां मना सके।
          
ईद के दिन सब लोग नए कपड़े पहनकर सज-धज कर सेवईयाँ और शीरखुरमा खाकर ईद की नमाज़ अदा करते हैं।ईद की नमाज़ से पहले गरीबों को फ़ितरा देना आवश्यक है।फ़ितरे में गेहूं या पैसे ग़रीबों को दिए जाते हैं।मर्द और छोटे बच्चे ईद गाह या मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हैं।औरतें घर में नमाज़ पढ़ती है। नमाज़ के बाद सब लोग एक-दूसरे के गले मिलकर ईद की मुबारक बात(बधाई) देते हैं।इसके बाद घर के बड़े बुजुर्ग अपने से छोटों को सलामी के तौर पर ईदी जो पैसे की शक्ल में देते है ।  
         
ईद मिलन का सिलसिला ईद के बाद पूरा महीना चलता है। सभी अपने रिश्तेदार- मित्रों से ईद मिलने उनके घर मिठाई, तोहफ़े लेकर जाते है । मेज़बान सेवई,
शीरखुरमा और विभिन्न लज़ीज़ (स्वादिष्ट) पकवानों से घर आये मेहमानों की ख़ूब ख़ातिरदारी करते हैं।ईद एकता,समानता एवं भाईचारे का प्रतीक है।
 
- शगुफ़्ता यास्मीन काज़ी 
   44, न्यू जागृति कॉलनी,काटोल रोड, 
   नागपुर- 440013
   editorshaufta@gmail.com
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