ग़ज़ल
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बे- सदा और बे-तलब कोई
इस तरह जी सके गा अब कोई
फिर उसी मोड़ पे वो छोड़े गा
दिल को बहाने लगे गा जब कोई
न हुआ दोस्त हो जा दुश्मन फिर
मिलने जुलने का हो सबब कोई
जो तेरी याद से भी ख़ाली हो
क्यों मयस्सर नहीं है शब कोई
चाँद भी छुप गया था बादल में
बाम पे आ गया था जब कोई
चौंक जाता हूँ फिर भी आहट पर
है यकीं आए गा न अब कोई
मिलते जुलते रहो ज़माने से
काम अजाए जाने कब कोई
बे- सदा = voiceless,
बे- तलब = Without Asking,
Without Any Inquiry,
सबब = cause, reason,
मयस्सर = available,
बाम = छत
- डॉ. समीर कबीर
नागपुर, महाराष्ट्र