सिंधी भाषा और संस्कृति पर हुआ सेमिनार
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नागपुर। दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषाओं में से एक खत्म होने की कगार पर है। हालांकि, सिंधी शिक्षाविदों का एक समूह न सिर्फ भाषा को, बल्कि उस संस्कृति को भी बचाने की कोशिश कर रहा है, जो उनके प्राचीन कबीलों की कहानी बताती है। यह सब सिंधी भाषा और संस्कृति पर एक सेमिनार का हिस्सा था, जिसे राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद,नई दिल्ली तथा विदर्भ सिंधी विकास परिषद, नागपुर ने मिलकर आयोजित किया था। विदर्भ सिंधी विकास परिषद के अध्यक्ष डाॅ. विंकी रुघवानी ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
कार्यक्रम की कन्वेनर प्रमुख शिक्षाविद् तथा राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद,नई दिल्ली की सदस्य डाॅ. वंदना खुशलानी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। मंच पर भारतीय सिंधू सभा के राष्ट्रीय संरक्षक घनश्यामदास कुकरेजा, विदर्भ सिंधी विकास परिषद के महासचिव पी.टी. दारा, डाॅ.हासो दादलानी, डाॅ.जयेश शर्मा, डाॅ.भरत खुशालानी, नाट्य निर्देशक तुलसी सेतिया, लेखक किशोर लालवानी, समाजसेवी विजय केवलरामानी तथा समाजसेवी मंजू कुंगवानी उपस्थित थे। सर्वप्रथम अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर इष्टदेव झूलेलाल तथा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। तत्पश्चात् श्रीमती मोहिनी बाबूवानी ने इष्टदेव झूलेलाल की स्तुति में एक गीत प्रस्तुत किया।
सिंधी शिक्षाविदों ने की अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने की बात डेटा एनालिस्ट और अंतरिक्ष अनुसंधान सलाहकार भरत खुशलानी ने भाषा संरक्षण और व्याख्या के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करने के बारे में भविष्यवादी दृष्टिकोण के साथ सेमिनार शुरू किया। उन्होंने सिंधी में न्च्ैब् मुख्य परीक्षा के पेपर का एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण दिया, जिसे आप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन द्वारा पहचाना नहीं जा सकता। अभी ।प् की मदद से सिंधी में ट्रांसलिटरेशन भी बहुत सटीक नहीं है। अगर हम इस दिशा में काम कर सकें, तो हम सिंधी साहित्य के कई दुर्लभ पुस्तकों को संरक्षित कर फिर से लोकप्रिय बना सकते हैं।
सेवानिवृत्त प्रोफेसर डाॅ.हासो दादलानी, जो अब शोधकर्ता और लेखक बन गए हैं, ने कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे को पूरक हैं। भाषा के विकास का एक जरूरी पहलू कहावतों एवं मुहावरों के जरिए भाषा को अलंकृत करता है। यह लोक ज्ञान का विकास है। आजकल, सिंधी बोलने वाले बुजुर्ग लोग भी इस की समृद्ध विरासत को, उनके इतिहास को तथा के जीवन जीने के तरीकों के बारे में नहीं जानते या उनका इस्तेमाल नहीं करते।
इन कहावतों और मुहावरों की मौजूदगी नई पीढ़ी को भाषा सिखाने को मजेदार बना सकती है। युवा भाषा विशेषज्ञ, जयेश शर्मा, जो एक पार्लियामेंट्री इंटरप्रेटर भी हैं, ने सिंधी भाषा के इतिहास और विकास के बारे में बात की। उन्होंने कहा, यह हैरानी की बात है कि हम आज भी उस भाषा में बात कर रहे हैं जो उस क्षेत्र से आती है जिसका जिक्र ऋग्वेद में किया गया था। इतने सदियों के आक्रमणों, बँटवारे, बड़े पैमाने पर पलायन और आधुनिक भारत में अपना कोई राज्य न होने के बावजूद हम ऐसा कर पाए, यह सच में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
युवाओं को न सिर्फ भाषा सीखनी चाहिए, बल्कि उसका इतिहास और सदियों से उसमें आए बदलावों को भी समझना चाहिए। डाॅ.वंदना खुशलानी ने सिंधी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए सभी शोधकर्ताओं और विद्वानों द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि समुदाय के युवा सदस्यों के बीच भाषा पर रिसर्च की जरूरत है। इसे सिर्फ विरासत के तौर पर आगे नहीं बढ़ाना है बल्कि यह उनके साझा इतिहास को समझने का एक जरिया भी है।
तुलसी सेतिया ने सरकारी संस्थानों व विभिन्न राज्यों की सिंधी अकादमियों द्वारा सिंधी भाषा व संस्कृति के जतन हेतु दिये जा रहे योगदान पर चर्चा की। किशोर लालवानी ने भाषा व संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए आवाजी कल्चर को सशक्त जरिया बताया। कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती सोना मोटवानी ने किया। विजय विधानी ने आए हुए अतिथियों का आभार प्रकट किया।
