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सफल रहा 'किताबें बोलती है' साहित्यिकी का उपक्रम


नागपुर। विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिकी में 'किताबें बोलती हैं' का अत्यंत सफल आयोजन संपन्न हुआ।अतिथि अध्यक्ष कल्पना शुक्ला का स्वागत आदेश जैन ने किया। कार्यक्रम का आरंभ साहित्यकार तन्हा नागपुरी ने अमृता प्रीतम की रचना रसीदी टिकट से किया। माधुरी राऊलकर ने ककसाड पत्रिका से डाॅ सुमनलता सिंह की राबिया के रोजे की कहानी सुनाई। रामकुमार गोनकर ने अमीबा की कहानी से लेकर*अंधविश्वास से मुक्ति तक बात कही। 


अमीता शाह ने ओशो रजनीश की चर्चा की, रमेश मौंदेकर ने प्रिया देवांगन के रामराज्य की बात कही। सुरेखा खरे ने दौलत राव वाडेकर की हे कृष्ण प्रश्न ही प्रश्न से बढिया अंश  सुनाकर मंत्रमुग्ध किया। मंजुषा कानाडे ने अमृता प्रीतम को याद किया और रचना दी देवयानी बैनर्जी ने महेंद्रनाथ गुप्ता की रामकृष्ण वचनामृत से साकार निराकार की सत्ता पर बात रखी। अनीता आगरकर ने श्रीमद रामचंद्राचार्य की अनमोल चर्चा से कक्ष को अभिभूत कर दिया। 

लक्ष्मी नारायण केसकर ने 1986 के मार्च कांफ्रेंस पर बात करते हुये अमृता प्रीतम को आदरांजलि दी। अरुण खरे ने सुरेखा खरे की पुस्तक से चंडमुंड महाकाली वीभत्स रस का रसमय पाठ किया। मंजुषा कानाडे ने सुंदर संवाद शैली में मोक्ष मार्ग का विवेचन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षा कल्पना शुक्ला ने शैल चतुर्वेदी की हास्य रचना सुनाकर और सारगर्भित भाषण विवेचन से कक्ष को रससिक्त कर दिया।हेमलता मिश्र मानवी ने वरिष्ठ साहित्यकार आशा पांडेजी की 'विचार मौक्तिक' से सूक्तियां सुनाईं और कार्यक्रम का सरस संचालन किया। शादाब अंजुम ने आभार ज्ञापित किया।
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