तू भी शिव
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तू भी शिव ।
हममें पनपी
दूरी क्यूँ ,
बीच में उभरी
दिवार क्यूँ,
मैं भी शिव
तू भी तो शिव ।
तू भी जन्मा
मैं भी जन्मा
मैं भी राख
तू भी तो राख।
फिर क्यूँ
इतनी चहल पहल
क्यूँ विनाश विलाप
व्यर्थ कोलाहल।
है क्यूँ पनपा
यह जातपात
यह द्वेष द्वन्द्व
यह मार-काट।
यह आत्मश्लाघा
यह युद्ध नाद
यह करुण गीत
यह आर्तनाद ।
निदारुण क्रंदन
शुष्क होंठ
यह आत्मघात
हृदय पे चोट।
भटके क्यूँ
भूल भुलैय्या में
हाथ मिलाएँ
चले साथ-साथ ,
क्यूँ न कर लें
यह आत्मसात्
कि मैं भी शिव
तू भी तो शिव ॥
- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर, महाराष्ट्र