युद्ध : एक महाशून्य
https://www.zeromilepress.com/2026/03/blog-post_2.html
युद्ध क्या है?
कुछ लोगों के अहं का विस्तार,
और कुछ ही क्षणों में
असंख्य सपनों का संहार।
तोप चले या मिसाइल गिरे,
घायल होती है सिर्फ़ धरती नहीं
घायल होती है इंसानियत,
टूटती है उम्मीदों की कड़ी।
ईश्वर ने बनाई थी बस एक दुनिया,
बिना सीमाओं, बिना दीवारों के;
लकीरें हमने खींचीं
अपने नाम, अपने मान के लिए,
और उन्हीं लकीरों को बड़ा करने में
बहा दिया खून,
उजाड़ दी ज़िंदगियाँ।
युद्ध कर देता है सब कुछ शून्य
ऐसा शून्य
जहाँ से लौटना आसान नहीं।
जहाँ कभी कोई सपना
धीरे- धीरे बुना गया था।
वह छीन लेता है
सपनों के धागे,
जीवन की ऑक्सीजन,
बचपन की हँसी,
यौवन की ऊर्जा,
बुढ़ापे की शांति
सब कुछ एक साथ।
क्या मिलता है युद्ध से?
यह प्रश्न
कभी पूरी तरह पूछा ही नहीं गया।
पूछा होता
तो शायद उत्तर में मिलता
एक लंबा मौन,
एक गहरा शून्य।
जब मिसाइल आकाश से
धरती पर गिरती होगी,
क्या वह भी नहीं पूछती होगी -
जिस मिट्टी ने मुझे जन्म दिया,
आज उसी को उजाड़कर
मैं फिर उसी की आगोश में समा जाऊँगी?
कहाँ चले जाते हैं वे भाषण,
जो वैश्विक मंचों पर
एकता, समानता और विकास की बातें करते हैं?
क्यों ज़रूरी बातें
ज़रूरत के समय
ज़रूरी नहीं रह जातीं?
युद्ध में हारता या जीतता कोई एक देश नहीं
हारती है मानवता,
जीतता है अहं
और
शर्मसार होती है सभ्यता।
मासूम जीवन,
नन्हा बचपन,
सपनों से भरा यौवन,
और थका हुआ बुढ़ापा
सब एक साथ
राख में बदल जाते हैं।
अब तो सीख लें
मानवता को जीना,
सीमाओं से पहले
रिश्तों को देखना।
क्योंकि अंततः
युद्ध किसी को विजेता नहीं बनाता
वह सिर्फ़
एक और शून्य छोड़ जाता है
महाशून्य
हमारी स्मृतियों में,
हमारे इतिहास में,
और हमारी आत्मा में,
आने वाली पीढ़ियों में,
जहाँ से लौट आना मुश्किल होता है
बहुत मुश्किल।
