ग़ज़ल :
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बस एक मेरा ही कोई पता नहीं होता
ये कैसा कर्ज़ है मुझ पे तेरी मोहब्बत का
किया है मैं ने अदा पर अदा नहीं होता
के तूने मुझ से ही हिजरत लिखा तो ली लेकिन
जुदा है मुझ से वो फिर भी जुदा नहीं होता
कहाँ तलक मैं तेरे साथ साथ चल पाया
के रास्तों का तो कुछ भी पता नहीं होता
है कौन जो मुझे बस ख़्वाब ख़्वाब दिखता है
जो आँख खोलू तो कुछ भी पता नहीं होता
चाराग ए दिल कहाँ टूटा है कुछ पता तो करो
धुवां धुवां सा इतना जला नहीं होता
- समीर कबीर
नागपुर, महाराष्ट्र
