प्रभु चौधरी का योगदान अविस्मरणीय, उनके नाम पर हो मार्ग का नामकरण : प्रो. शर्मा
महामहिम राज्यपाल श्री गेहलोत ने की वरिष्ठ हिंदी सेवी डॉ. प्रभु चौधरी के चित्र पर पुष्पांजलि, राष्ट्रीय गोष्ठी में भावभीने श्रद्धासुमन एवं स्मरणांजलि अर्पित
देश की जानी- मानी संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के तत्वावधान में संस्था के संस्थापक, साहित्यकार, हिंदी एवं नागरी लिपि सेवी डॉ. प्रभु चौधरी के प्रति भावभीने श्रद्धासुमन एवं स्मरणांजलि अर्पित करने हेतु राष्ट्रीय गोष्ठी सम्पन्न हुई। कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल श्री थावरचंद गेहलोत ने श्री प्रभु चौधरी के पैतृक निवास कसारी चौहान पहुंच कर श्री चौधरी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और परिवार जनों के प्रति शोक संवेदना व्यक्त की। इस अवसर पर श्री चौधरी के ज्येष्ठ पुत्र श्री जितेंद्र चौधरी, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा सहित सैकड़ों की संख्या में परिवारजन और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
स्मरणांजलि गोष्ठी के अध्यक्षीय उद्बोधन में सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने कहा कि श्री चौधरी एक कर्मठ और सेवानिष्ठ व्यक्तित्व थे, उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनमें नैसर्गिक प्रतिभा थी, जिसका उत्तरोत्तर विकास हुआ। उनके विविधमुखी योगदान पर केंद्रित प्रकाशन किया जाएगा। उन्होंने उज्जैन के साथ ही महिदपुर - आलोट क्षेत्र को राष्ट्रीय ख्याति दिलवाने में अविस्मरणीय योगदान दिया। उनके नाम पर महिदपुर रोड क्षेत्र में मार्ग का नामकरण किया जाना चाहिए। वे प्रत्येक संस्कृतिकर्मी की चिंता करते थे।
राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के संरक्षक एवं वरिष्ठ शिक्षाविद श्री बी के शर्मा ने कहा कि प्रभु चौधरी में अनुपम संगठनात्मक प्रतिभा थी। कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल श्री थावरचंद गेहलोत जी श्री चौधरी जी को सम्मान देते थे।
डॉ. हरिसिंह पाल, महामंत्री नागरी लिपि परिषद, दिल्ली ने कहा, उनकी यशकाया उनके कार्यों से हमेशा जीवित रहेगी। वो जो ठान लेते थे, हर स्थिति में करके रहते थे। डॉ अशोक कुमार भार्गव, नागरी लिपि प्रमुख, मध्यप्रदेश इकाई, पूर्व आई ए एस अधिकारी ने कहा कि उन्होंने नागरी लिपि, हिंदी के प्रचार- प्रसार के लिए अथक प्रयास किए।
कार्यकारी अध्यक्ष, श्रीमती सुवर्णा जाधव जी ने कहा प्रभु चौधरी से हमने बहुत कुछ सीखा। उन्होंने अलग- अलग जगह साहित्य सम्मेलन आयोजित किए। जहां हमें निरन्तर प्रवास का मौका मिला। डॉ. शहनाज शेख, पुणे, सचिव राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन ने कहा प्रभुजी मॉरीशस में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी करने वाले थे। उनके कई कार्य अधूरे रह गए।
प्रो.आफताब अनवर शेख, प्राचार्य, च्वाइस पुणे, कॉलेज ने कहा -युग पुरुष थे प्रभुजी। उनका ऋषि तुल्य व्यक्तित्व था।
समाजसेवी डॉ.शिवा लोहारिया, जयपुर ने कहा उनके कार्यों के बारे में बोलना सूर्य को दिया दिखाना है।
श्री हरे राम वाजपेयी, हिंदी परिवार इंदौर ने कहा इस संस्था के माध्यम से पूरे भारत को जोड़ने का कार्य किया। डॉ. रश्मि चौबे, गाजियाबाद, राष्ट्रीय प्रवक्ता, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि डॉ. प्रभु चौधरी का जाना अपूरणीय क्षति है। हमें उनके द्वारा बताए मार्ग पर चलते हुए शेष कार्यों को करते रहना होगा।
डॉ. रणजीत सिंह अरोरा, पुणे ने कहा, उनके लिए हिंदी भाषा नहीं देश की आत्मा थी। वे राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना की धड़कन थे।
डॉ. अनसूया अग्रवाल, छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय महिला इकाई अध्यक्ष राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने कहा, प्रभुजी अंत तक साहित्य सेवा करते हुए गए।
डॉ. उर्वशी पण्ड्या, गुजराती विभागाध्यक्ष मुंबई यूनिवर्सिटी ने कहा हम मुंबई विश्वविद्यालय की ओर से उनकी स्मृति में कार्यक्रम करेंगे। श्रीमती श्वेता मिश्रा, पुणे ने कहा कि हम प्रभु जी के लिए संचेतना के कार्यों को आगे बढ़ाते रहेंगे।
श्री पद्मचंद गांधी, राष्ट्रीय संयोजक राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने कहा कि वे सरल व्यक्तित्व के धनी थे उनके कार्यों को पूरा करना चाहिए।
डॉ. गोकुलेश्वर द्विवेदी, सचिव, विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, उत्तर प्रदेश ने कहा प्रभु जी नारी शक्ति के सम्मान के लिए साल में दो या तीन बार कार्यक्रम करते थे। श्री महेंद्र कुमार, अध्यक्ष, एक प्रयास भारत, पुणे ने कहा- प्रभुजी कहते थे, अचानक हिंदी राष्ट्रभाषा घोषित हो जाएगी।
डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक, राष्ट्रीय संयोजक, छत्तीसगढ़, ने कहा - प्रभु जी में लोगों को जोड़ने की विशेष क्षमता थी।
श्रीमती भावना गुप्ता, ने कहा -हिंदी के लिए कार्य करना मेरी ओर से श्रद्धांजलि होगी। श्रीमती गरिमा प्रपन्ना ने कहा कि प्रभुजी ने बहुत सिखाया है।
श्रीमती मनीषा ठाकुर ने कहा कि प्रभु जी के कार्य करने का जज़्बा और प्रणाली अलग ही थी। डॉ. संगीता तिवारी ने कहा -उनका जाना शिक्षा और साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
डॉ जितेंद्र तिवारी, डायरेक्टर एस. एम. डी. टी. यूनिवर्सिटी, मुंबई ने कहा उनमें कुछ कर दिखलाने की ललक थी, सरलता, सहजता और अपनापन उनके स्वभाव में था।
कार्यक्रम में महेन्द्र कुमार, श्रीमती मेरु प्रभा मुम्बई ने भी विचार व्यक्त किए। श्री प्रमोद मेहता, आलोट, डॉ. सुशीला, गीता सिंह, निर्मल मेहता, मुंबई, अमृता अनुभूति, डॉ. संगीता पाल, डॉ. संगीता तिवारी, भावना गुप्ता, जगदीश कौर प्रयागराज, मुमताज पठान, नियति अग्रवाल, रामलखन पाल, सुषमा कोनड़े, उर्वशी पांडे, महेंद्र कुमार, कृष्णा जोशी, आदि सहित अनेक गणमान्यजन ने उपस्थित रहकर शोक व्यक्त किया।