एक कदम बदलाव की और..
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हम इंटरनेशनल वुमेंस डे इसलिए मनाते हैं क्योंकि यह दिन महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है। लेकिन यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल इतना नहीं है कि महिलाओं को अवसर दिए जाएँ, उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया जाए, या उन्हें आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से बराबरी मिले। निश्चित रूप से यह सब सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसका एक और गहरा और संवेदनशील पहलू भी है, एक महिला दूसरी महिला को कितना समझती है, कितना सम्मान देती है और कितना सहयोग करती है। सशक्तिकरण का अर्थ है, एक महिला दूसरी महिला के दुख को समझे, उसकी परिस्थितियों को महसूस करे और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करे।
कहा भी जाता है - ‘दुनिया में यदि सबसे अधिक करुणा और संवेदनशीलता किसी में होती है, तो वह एक महिला के हृदय में होती है।” लेकिन यदि एक महिला ही दूसरी महिला की भावनाओं को न समझ सके, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं हम सशक्तिकरण के वास्तविक अर्थ से दूर तो नहीं हो रहे।
'कुमकुम और एक महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता'
जब हम कुमकुम की बात करते हैं, तो यह केवल एक प्रतीक है, एक भौतिक चिन्ह। किसी महिला का सामाजिक स्तर, उसका सम्मान या उसके जीवन की परिस्थितियाँ इस बात से निर्धारित नहीं होतीं कि वह कुमकुम लगाती है या नहीं। एक महिला विवाहित हो, अविवाहित हो, तलाकशुदा हो या अकेले जीवन जी रही हो- यह उसकी अपनी जीवन यात्रा है।
किसी महिला के जीवन में किसी पुरुष की उपस्थिति या अनुपस्थिति उसके व्यक्तित्व या सम्मान का मापदंड नहीं हो सकती।
इसीलिए कुमकुम लगाना या न लगाना भी उसी महिला की व्यक्तिगत पसंद है। किसी भी समाज को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी महिला की व्यक्तिगत पसंद, उसकी स्वतंत्रता या उसकी पहचान को नियंत्रित करे।
यदि किसी सभा में, चार लोगों के बीच, या समाज के सामने कोई महिला दूसरी महिला को कुमकुम लगाने से रोकती है, या उसे ये कहती हैं कि तुम्हें तो इसकी आदत हो गई होगी, तो यह वास्तव में उस महिला की मानसिक स्थिति और उसकी सोच का स्तर प्रकट करता है। यह दर्शाता है कि उसकी सोच कितनी सीमित, संकीर्ण और अविकसित है। ऐसी स्थिति में उस महिला की बातों को अत्यधिक महत्व देने की आवश्यकता नहीं है। हमें यह समझकर आगे बढ़ जाना चाहिए कि वह अभी परिपक्व नहीं है, उसकी सोच अभी विकसित नहीं हुई है, और वह अभी भी अज्ञानता और संकीर्ण सोच से प्रभावित है।
और यदि आज के इस आधुनिक युग में भी कोई महिला केवल कुमकुम जैसे बाहरी प्रतीक को इतना महत्व देती है कि वह दूसरी महिला को उसे लगाने से रोकने लगे, तो यह उसके संकीर्ण दृष्टिकोण, रूढ़िवादी सोच और अल्पविकसित मानसिकता का ही प्रमाण है।
'कुमकुम और सौभाग्य की वास्तविक अवधारणा'
भारतीय समाज में परंपरागत रूप से कुमकुम को सौभाग्य का प्रतीक माना गया है और इसे मुख्यतः विवाहित स्त्रियों से जोड़ा गया है। लेकिन यदि हम इस विषय को गहराई और तर्क के साथ समझें, तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है, क्या पति की मृत्यु के बाद स्त्री का सौभाग्य समाप्त हो जाता है? मेरे विचार से ऐसा बिल्कुल नहीं है। सौभाग्य किसी व्यक्ति के जीवन का केवल बाहरी प्रतीक नहीं है और न ही यह किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर करता है। सौभाग्य वास्तव में एक आंतरिक शक्ति, आत्मविश्वास और जीवन को आगे बढ़ाने की क्षमता का प्रतीक है। हर व्यक्ति जब जन्म लेता है, तो वह अपना भाग्य और संभावनाएँ साथ लेकर आता है। जीवन में आने वाली परिस्थितियाँ—चाहे सुख की हों या दुख की,उसके अस्तित्व और उसकी शक्ति को समाप्त नहीं कर सकतीं। यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती है, तो यह एक दुःखद घटना अवश्य है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उस स्त्री का सौभाग्य समाप्त हो गया।
एक स्त्री का सौभाग्य उसके स्वाभिमान, उसकी क्षमता, उसके व्यक्तित्व और उसके जीवन को संवारने की शक्ति में निहित होता है।
कुमकुम यदि शक्ति, मंगल और सौभाग्य का प्रतीक है, तो वह शक्ति स्त्री के भीतर भी विद्यमान है। इसलिए सौभाग्य को केवल वैवाहिक स्थिति से जोड़कर देखना एक सीमित दृष्टिकोण हो सकता है। वास्तव में सौभाग्य वह है जिसे हम अपने साहस, कर्म और आत्मविश्वास से निर्मित करते हैं। हमें अपना सौभाग्य बनाने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। एक विचारोत्तेजक पंक्ति में कहें तो, ‘सौभाग्य किसी रिश्ते का मोहताज नहीं होता, यह उस शक्ति का नाम है जिसे हम अपने साहस और कर्म से स्वयं रचते हैं।”
'समाज और हमारे विचार'
समाज लोगों से बनता है, और लोगों के विचारों से ही समाज का स्वरूप निर्मित होता है। इसलिए जैसे लोगों के विचार होंगे, जितने आधुनिक और व्यापक विचार होंगे, समाज भी वैसा ही बनेगा। इसी कारण हमें अपने विचारों को सुधारने की आवश्यकता है। हमें अपने विचार इस प्रकार रखने चाहिए कि वे दूसरों के हित में कार्य करें, न कि दूसरों की निंदा करें या उन्हें ताने देकर अपमानित करें।
'इतिहास से मिलने वाली प्रेरणा'
इतिहास साक्षी है कि हमारे समाज में ऐसे अनेक महान विचारक और समाज सुधारक हुए हैं जिन्होंने महिलाओं के सम्मान, शिक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजाराम मोहन राय, महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे महान व्यक्तित्वों ने समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। इन महापुरुषों ने समाज को यह सिखाया कि स्त्री की गरिमा और सम्मान किसी बाहरी प्रतीक से नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा, उसकी स्वतंत्रता और उसके व्यक्तित्व से तय होते हैं। समय के साथ समाज बदला है, विचार बदले हैं, और आज महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। लेकिन इसके बावजूद यदि कहीं किसी महिला को उसके माथे के कुमकुम के आधार पर परखा जाता है, तो यह वास्तव में उस सोच की कमजोरी को ही दर्शाता है।
'इतिहास की महान महिलाएँ और हमारा आदर्श'
हमारे इतिहास में अनेक ऐसी महान महिलाएँ हुई हैं जो आज भी हमारे लिए प्रेरणा और आदर्श हैं। रानी लक्ष्मीबाई और अहिल्याबाई होलकर इसके महान उदाहरण हैं। अपने पतियों की मृत्यु के बाद इनका राज्याभिषेक भी हुआ और उन्होंने पूरे साहस और आत्मविश्वास के साथ अपने राज्य का नेतृत्व किया। जब वे युद्धभूमि में युद्ध के लिए निकलीं, तब उन्होंने अपने माथे पर तिलक भी लगाया था। वह तिलक उनके साहस, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का प्रतीक था। इसलिए आज के युग में हमारे आदर्श वे महान महिलाएँ होनी चाहिए, न कि वे महिलाएँ जो एक-दूसरे को ताने देती हैं, या चार लोगों के बीच किसी अकेली या स्वतंत्र जीवन जीने वाली महिला को अपमानित करने का प्रयास करती हैं। इसलिए जब हम 'इंटरनेशनल वुमेंस डे' मनाते हैं, तो यह केवल एक उत्सव नहीं होता, बल्कि एक संदेश होता है, कि महिलाओं को केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि सम्मान, समझ और एक-दूसरे का साथ भी देना होगा। क्योंकि अंततः सच्चा महिला सशक्तिकरण वही है, जहाँ एक महिला दूसरी महिला की स्वतंत्रता की रक्षा करती है, उसकी पसंद का सम्मान करती है और उसके साथ खड़ी रहती है, उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
- प्रणोति बागड़े
नागपुर, महाराष्ट्र