भीषण गर्मी में परीक्षा : छात्रों की सेहत से समझौता क्यों?
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गर्मी के चरम पर परीक्षा, बढ़ी चिंता :
विदर्भ क्षेत्र में भीषण गर्मी के बीच परीक्षाओं के आयोजन को लेकर छात्रों और अभिभावकों में गहरा असमंजस और असंतोष देखा जा रहा है। राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विद्यापीठ की परीक्षाएं ऐसे समय में आयोजित की जा रही हैं जब नागपुर सहित पूरे विदर्भ में तापमान 44 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। इस भीषण गर्मी में जहां सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है, वहीं छात्रों को परीक्षा केंद्रों तक तेज धूप में पहुंचकर कई घंटों तक बैठकर परीक्षा देना पड़ रहा है, जो उनके स्वास्थ्य और प्रदर्शन दोनों के लिए चुनौती बन गया है।
परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था पर सवाल :
परीक्षा केंद्रों की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई केंद्रों पर पंखे लगे होने के बावजूद बंद पाए जाते हैं, कूलर या तो उपलब्ध नहीं हैं या खराब स्थिति में हैं, जबकि पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं होती। कई जगहों पर पानी की टंकियों की नियमित सफाई नहीं होने से छात्र दूषित पानी पीने के जोखिम से बचने के लिए घर से पानी ले जाना ही सुरक्षित मानते हैं। ऐसे में यूनिवर्सिटी द्वारा पारदर्शी पानी की बोतल लाने का निर्देश छात्रों के लिए अतिरिक्त परेशानी का कारण बन रहा है, क्योंकि इससे वे ठंडा पानी रखने वाली बोतलों का उपयोग नहीं कर पाते, जबकि इस भीषण गर्मी में ठंडा पानी ही उन्हें कुछ राहत दे सकता है। नकल रोकने के तर्क के बावजूद इस नियम की व्यवहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं।
विदर्भ की जलवायु और बढ़ती गर्मी का असर :
विशेषज्ञों के अनुसार विदर्भ, खासकर नागपुर, देश के सबसे अधिक गर्म क्षेत्रों में शामिल है जहां हर वर्ष अप्रैल और मई में तापमान 45 डिग्री से ऊपर पहुंच जाता है और लू की स्थिति सामान्य हो जाती है। कंक्रीटीकरण और पेड़ों की कटाई के कारण गर्मी की तीव्रता और बढ़ी है। दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहर निकलना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है, लेकिन इसी समय कई परीक्षाएं आयोजित हो रही हैं, जिससे छात्रों की परेशानी और बढ़ रही है।
स्वास्थ्य पर पड़ रहा गंभीर प्रभाव :
चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यधिक गर्मी में परीक्षा देना जोखिम भरा है। इस दौरान हीट एग्जॉशन, हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, हृदय और मस्तिष्क पर दबाव जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यदि कोई छात्र लू का शिकार हो जाता है, तो उसकी शैक्षणिक प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है और पूरा वर्ष भी खराब हो सकता है।
डॉक्टर की राय: सावधानी ही बचाव :
चिकित्सक डॉ. उदय बोधनकर के अनुसार, अत्यधिक गर्मी में शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं, जिनमें हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी स्थितियां जानलेवा हो सकती हैं। उनका कहना है कि दोपहर के समय बाहर निकलने से बचना, पर्याप्त पानी और इलेक्ट्रोलाइट लेना, हल्के व सूती कपड़े पहनना तथा धूप से बचाव के उपाय अपनाना बेहद जरूरी है। यदि इन सावधानियों का पालन न किया जाए तो विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
पुरानी व्यवस्था और वर्तमान बदलाव :
पूर्व में विदर्भ क्षेत्र में परीक्षाएं अप्रैल से पहले ही समाप्त कर दी जाती थीं और उसके बाद दो माह की ग्रीष्मकालीन छुट्टियां दी जाती थीं, जिससे छात्र और शिक्षक दोनों को राहत मिलती थी। लेकिन वर्तमान शैक्षणिक नीतियों और समय-सारणी में बदलाव के कारण अब परीक्षाएं गर्मी के चरम समय में आयोजित हो रही हैं।
सरकारी निर्देश और जमीनी हकीकत :
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने स्कूलों का समय सुबह 7:30 से 10:30 तक रखने के निर्देश दिए हैं, इसके बावजूद कई निजी और सीबीएसई स्कूल दोपहर तक संचालित हो रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या इन निर्देशों का सही तरीके से पालन हो रहा है और क्या सभी संस्थानों पर समान नियम लागू किए जा रहे हैं।
समाधान की जरूरत :
नर्व स्टीमूलेशन थेरेपिस्ट व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. प्रवीण डबली का मानना है कि परीक्षाओं का समय स्थानीय मौसम के अनुरूप निर्धारित किया जाना चाहिए। सुबह के ठंडे समय में परीक्षा आयोजित करने, परीक्षा सत्र को अप्रैल से पहले समाप्त करने, सभी परीक्षा केंद्रों पर पंखे, कूलर और स्वच्छ पानी की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा औचक निरीक्षण कर लापरवाही पर कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है। साथ ही छात्रों को सुरक्षित और पर्याप्त पानी ले जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। भीषण गर्मी में परीक्षा अब केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है, जिस पर विश्वविद्यालय और प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेने की आवश्यकता है।
नागपुर, महाराष्ट्र
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