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चमकते रहो..


माई से बहुत दिनों से 
भेंट नहीं हुई थी,
तो हम सपत्नीक उनके घर गए।
गुरुजी मुंबई गए हुए थे,
तो माई  घर में अकेली थीं।
हमें देखते ही जैसे घर में
रौनक लौट आई,
वो हमारी आवभगत में जुट गईं।

श्रीमती के लिए माई का घर
मायके जैसा ही था।
वहीं सहजता,
वही लाड़-प्यार,
पसंद के व्यंजन,
और बिना कहे
मिलने वाला अपनापन।

लेकिन इस बार
श्रीमती की आँखों में
एक हल्की सी थकान थी।
कॉलेज में सब ठीक था,
पेपर्स पब्लिश हो रहे थे,
स्टूडेंट्स खुश थे,
काम में कोई कमी नहीं थी।
फिर भी प्रमोशन अटका हुआ था,
क्योंकि प्राचार्य खुश नहीं थे।
बात  उस के काम की नहीं,
उन के छोटे मन की थी।

माई के साथ किचन में
उन की बातों का सिलसिला चला,
जैसे खाना नहीं, 
प्रसाद पक रहा हो।
और मैं ड्रॉइंग रूम में
अकेला बैठा रहा।
रात को खाना हुआ,
कॉफी हुई,
और हम लौट पड़े।

कार में अचानक
श्रीमती बोली,
“माई सच में कमाल हैं…
उनके पास हर समस्या का समाधान है।”
मैंने देखा,
श्रीमती के चेहरे पर अब बोझ नहीं,
एक अजीब सी चमक थी।
वो आगे बोली-
‘आज उन्होंने एक कहानी सुनाई,
जुगनू और साँप की..?

जंगल की काली रात में
एक साँप
एक जुगनू के पीछे पड़ गया।
जुगनू अपनी जान बचाने के लिए
भागता रहा..
भागते-भागते,
एक सुरक्षित जगह पहुँचा
और हाँफते हुए बोला-
‘साँप भाई,
मैं आपका आहार नहीं हूँ?”
‘नहीं’।
मैंने आपका कुछ बिगाड़ा’?
‘नहीं’।
‘आपको मुझसे कोई नुकसान’?
‘नहीं’।
‘तो फिर..
आप मेरा पीछा
 क्यों कर रहे हैं’?
साँप कुछ पल चुप रहा,
फिर बोला,
‘तुम छोटे से हो
यकश्चित हो, 
फिर भी चमकते हो,
यही मुझे खटकता है
मैं तुम्हें चमकते हुए
नहीं देख सकता’।

कुछ क्षण के लिए
जंगल में सन्नाटा छा गया।
जुगनू समझ गया,
समस्या उसकी गलती नहीं,
उसकी चमक है।

श्रीमती ने मेरी ओर देखा और कहा—
‘मुझे भी मेरी समस्या
 समझ आ गई…
मुझे जुगनू की तरह
बस एक सुरक्षित
स्थान तक पहुँचना है..
और उससे भी ज़रूरी,
मुझे रुकना नहीं है’।

थोड़ा रुककर वह मुस्कुराई-
‘मुझे.. चमकते रहना है’।
उसके चेहरे पर
इस बार सच में रोशनी थी,
विश्वास की,
और अपने रास्ते की पहचान की।

- राजेन्द्र चांदोरकर ‘अनिकेत’
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 2357833227608587237
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