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वोट बैंक की राजनीति है महिला आरक्षण : एस एन विनोद


नागपुर। विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभा कक्ष में ‘महिला आरक्षण विमर्श’ पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ संपादक पत्रकार एस. एन. विनोद ने विद्या लक्ष्मी पंडित की शिक्षा, योग्यता का संदर्भ दे उनके उत्कर्ष व राजनैतिक सहभागिता का हवाला दे महिलाओं की शिक्षा के साथ जाति, धर्म की राजनीति और मीडिया की उदासीनता को उनके प्रति जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा पारित बिल को आधार बना महिला आरक्षण देकर सरकार ने ईमानदार प्रयत्न करना चाहिए। कार्यक्रम में महिलाओं का प्रतिनिधित्व और केंद्रीय आकर्षण वरिष्ठ साहित्यकार इंदिरा किसलय ने माना महिलाएं राजनीतिक, सामाजिक जिम्मेदारियों  के प्रति पर्याप्त जागरूक नहीं हैं ।उन्हें प्राकृतिक रूप से पुरुषों को प्रोक्सी ना बना स्वयं को सुदृढ़ और शिक्षित कर नीति निर्धारण में सहभागिता तय करनी होगी। आज महिला आरक्षण से पहले उनके चेतना का जागरण जरूरी है।

वरिष्ठ संपादक पत्रकार नीरज श्रीवास्तव ने प्राकृतिक पुरुष नारी के शारीरिक रचना और शक्ति के पहलू के साथ जाति, धर्म का जहर फैला आरक्षण से असामानता के खड़े होने का जिक्र किया। आज महिलाएं अपनी क्षमता और कार्यशैली से हर क्षेत्र में उपयुक्त भूमिका निभा रही हैं और नीति निर्धारण में भी सहभागी हो रही हैं। वरिष्ठ विधि तज्ञ और साहित्यकार ओ. डी. जैन ने माना महिला आरक्षण मात्र राजनीतिक नंबर का खेल है। आज पंचायत, जिला परिषद के साथ चिकित्सा, चार्टर्ड अकाउंटेंट और एविएशन में अपनी अहम भूमिका महिलाएं निभा रही हैं। उनके आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में व्यावहारिक जागरुकता जरूरी है। 

प्रकाशक रीमा चड्डा को संशय है कि महिला आरक्षण से महिलाओं का उत्कर्ष होगा या नहीं? जनजातियों के पिछड़ेपन के लिए आरक्षण निश्चित जरूरी है और उनके उत्कर्ष हेतु कानून और कड़े होने चाहिए। संपादक, प्रकाशक डॉ कृष्ण नागपाल ने स्थानीय निकाय में 33% आरक्षण महिलाओं के लिए जो पहले से ही निश्चित है। सक्षम महिलाओं को आरक्षण की बैसाखी की कदापि जरूरत ही नहीं है। पत्रकार, व्यंग शिल्पी टीकाराम साहू आजाद का मत था मतदान के बाद जहां मतदाता का ही कोई मूल्य नहीं रहता है। उन्होंने आगे प्रश्न किया जब राजनीतिक दल आज महिलाओं को टिकट ही नहीं देते तो आरक्षण का दिखावा क्यों?

वरिष्ठ अधिकारी व चिंतक डॉ अनिल त्रिपाठी का कथन था पंचायती आरक्षण में नकारात्मक पहलू भी सामने आए हैं। महिलाओं के चुनने के बाद उनके घर का पुरुष ही सत्ता का संचालन करता है। जबकि महिलाओं को कानून बनाने में भी भागीदारी देनी होगी।  संपादक, कथाकार नरेंद्र परिहार ने राजनीतिक पहलू को केंद्र में रख सत्ता पक्ष और विपक्ष को नूरा कुश्ती करते हुए बताया। उन्होंने आगे कहा यह तब तक अमली जामा नहीं पहनेंगी, जब तक दोनों मैं पुरुष और महिला की सनातन मानसिकता में परिवर्तन नहीं आएगा और स्वयं की स्वीकार्यता नहीं बढ़ेगी। 

अग्रचिंतन के मालिक, संपादक दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में अंतर समझाए। शिक्षा ही महिलाओं की उपेक्षा का वातावरण खत्म कर, भावनात्मक प्रतिबद्धता से परिवर्तन ला सकती है। भाषा अधिकारी तेजवीर सिंह ने महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सहभागिता बढ़ा पुरुष प्रधान समाज में सेंध लगाई जा सकती है कि वकालत की। रेलवे के सेवा निवृत उप प्रबंधक पारस नाथ शर्मा ने राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ महिला आरक्षण का समर्थन कर, आरक्षण में आरक्षण की वकालत कर इसे 50% करने का समर्थन किया।

कार्यक्रम संयोजक और व्यंग्य शिल्पी डॉ राजेंद्र पटोरिया ने ‘महिला आरक्षण विमर्श’ का विषय खोलते हुए कहा परिसीमन आधारित आरक्षण की कल्पनाओं से परे महिलाओं की भागीदारी बढ़ा उनके उत्कर्ष के न्यायोचित व्यवस्था का वातावरण बनाना चाहिए।  आभार संस्था के सह संयोजक नरेंद्र परिहार ने माना। 17 में 2026 का विषय ‘सोशल मीडिया का प्रभाव’ विषय पर चर्चा होगी।
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